Baidyanath Dham in Kaimur: बिहार का 'खजुराहो'; शिवभक्ति, तंत्र साधना और इतिहास का अद्भुत संगम

कैमूर जिले का बैजनाथ धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारतीय स्थापत्य कला, इतिहास और तंत्र साधना का अद्भुत संगम भी है। सावन के महीने में यहां भगवान शि
कैमूर जिले का बैजनाथ धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारतीय स्थापत्य कला, इतिहास और तंत्र साधना का अद्भुत संगम भी है। सावन के महीने में यहां भगवान शिव के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों से भी हजारों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। विशेष रूप से जमानियां से कांवड़िए गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हुए बैजनाथ धाम पहुंचते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला और दुर्लभ मूर्तिकला के कारण भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का ध्यान आकर्षित करता है। वर्ष 1813 में प्रसिद्ध अंग्रेज सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने इस मंदिर का भ्रमण किया और इसकी स्थापत्य विशेषताओं का उल्लेख अपने यात्रा वृत्तांत में किया। बैजनाथ धाम को 'बिहार का खजुराहो' कहा जाता है, जिसका कारण मंदिर की वास्तुकला और परिसर में मौजूद दुर्लभ शिल्पकृतियां हैं। यह मंदिर चंदेलकालीन स्थापत्य शैली में निर्मित है और इसकी संरचना मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर से मिलती-जुलती है। मंदिर का निर्माण अष्टकोणीय आधार पर किया गया है, जिसमें मकर तोरणद्वार के अवशेष, अलंकृत स्तंभ और पत्थरों पर उकेरी गई उत्कृष्ट कलाकृतियां शामिल हैं।
बैजनाथ धाम की दीवारों और परिसर में अंकित मूर्तियों में नृत्यरत अप्सराएं, विभिन्न भाव-भंगिमाओं में सुंदरी प्रतिमाएं, त्रिमूर्ति भैरव, गणेश, वाराही, नटराज और अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ मैथुनरत मानव एवं पशुओं की मूर्तियां भी शामिल हैं। इन कलाकृतियों को देखने के लिए श्रद्धालुओं के साथ बड़ी संख्या में इतिहास और कला में रुचि रखने वाले लोग भी यहां पहुंचते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, बैजनाथ धाम प्राचीन काल में तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के अतिरिक्त उत्तरी दीवार पर योनि का अंकन भी इस परंपरा की पुष्टि करता है। तांत्रिक परंपरा में नौ कुंडों का विशेष महत्व होता है और इसी परंपरा के अनुसार मंदिर परिसर के चारों कोनों पर ब्रह्म कुंड, विष्णु कुंड, रुद्र कुंड और ध्रुव कुंड का निर्माण कराया गया था। इनमें से तीन कुंड आज भी मौजूद हैं और मंदिर की प्राचीनता के साक्ष्य के रूप में देखे जाते हैं।









