Breaking the Myth of Gentle Parenting: पश्चिम में जेंटल पैरेंटिंग का मिथक टूटा

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी देशों में जेंटल पैरेंटिंग, जिसे बिना डांट-फटकार और अत्यधिक स्नेहपूर्ण परवरिश के रूप में परिभाषित किया जाता है, तेजी से लोकप्रियता ह
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी देशों में जेंटल पैरेंटिंग, जिसे बिना डांट-फटकार और अत्यधिक स्नेहपूर्ण परवरिश के रूप में परिभाषित किया जाता है, तेजी से लोकप्रियता हासिल कर रहा है। इस दृष्टिकोण का एक प्रमुख उदाहरण नॉर्वे मॉडल है, जिसमें बच्चों को जरा-सी भी डांट-फटकार लगाने पर अभिभावकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह विचारधारा ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस और अन्य कई देशों में भी अपनाई गई है। हालांकि, अब इस मॉडल को लेकर पश्चिमी देशों में गंभीर बहस छिड़ गई है। कई विशेषज्ञ इस बात की चेतावनी दे रहे हैं कि यह दृष्टिकोण बच्चों के भविष्य के लिए हानिकारक हो सकता है। उनका कहना है कि बिना उचित अनुशासन के बच्चे जिद्दी और असामाजिक हो सकते हैं, जिससे उनके विकास में बाधा आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जेंटल पैरेंटिंग के सिद्धांतों के तहत बच्चों को अनुशासन सिखाने के बजाय उन्हें केवल प्यार और स्नेह देकर बड़ा किया जा रहा है। इससे बच्चों में आत्म-नियंत्रण और सामाजिक व्यवहार की कमी हो सकती है। कई माता-पिता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या यह तरीका वास्तव में बच्चों के लिए सही है। कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है कि ऐसे बच्चे जो बिना किसी अनुशासन के बड़े होते हैं, वे बड़े होकर अधिक जिद्दी और स्वार्थी बन सकते हैं। इसके अलावा, ऐसे बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी देखने को मिल रही हैं।
इस बहस ने पश्चिमी समाज में एक नई चर्चा को जन्म दिया है, जिसमें माता-पिता, शिक्षाविद और मनोवैज्ञानिक सभी शामिल हैं। कुछ लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि बच्चों को प्यार और अनुशासन दोनों की आवश्यकता होती है। वे यह भी मानते हैं कि बच्चों को सही और गलत का अंतर समझाना बेहद जरूरी है। जेंटल पैरेंटिंग के समर्थक इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चों को स्नेह और समर्थन की आवश्यकता होती है, लेकिन अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह तरीका वास्तव में बच्चों के लिए फायदेमंद है या नहीं। इस बहस के परिणामस्वरूप, माता-पिता को अपने पालन-पोषण के तरीकों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।









