Chhattisgarh Daughter Wins Silver Medal: अस्पताल में भर्ती भाई से किया था ज्ञानेश्वरी ने पदक जीतने का वादा

राजनांदगांव की बेटी ज्ञानेश्वरी यादव ने राष्ट्रमंडल खेलों में अपनी मेहनत और संघर्ष को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाते हुए रजत पदक जीता है। यह उपलब्धि स्कॉटलैंड के ग्लास
राजनांदगांव की बेटी ज्ञानेश्वरी यादव ने राष्ट्रमंडल खेलों में अपनी मेहनत और संघर्ष को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाते हुए रजत पदक जीता है। यह उपलब्धि स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में आयोजित 53 किलोग्राम महिला भारोत्तोलन स्पर्धा में हासिल की गई, जहां उन्होंने कुल 199 किलोग्राम वजन उठाया। ज्ञानेश्वरी की यह जीत उनके परिवार के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उनके भाई रितेश यादव एक दुर्घटना में घायल होने के कारण अस्पताल में भर्ती हैं। ज्ञानेश्वरी ने अपने भाई से वादा किया था कि वह पदक जीतेगी, और उसने अपने इस वादे को पूरा कर दिखाया। उनके पिता दीपक यादव ने बताया कि ज्ञानेश्वरी ने अस्पताल में अपने भाई से बात की थी और उसे आश्वासन दिया था कि वह पदक जीतेगी। यह जीत न केवल ज्ञानेश्वरी के लिए, बल्कि उनके परिवार के लिए भी गर्व का क्षण है।
ज्ञानेश्वरी की सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष और परिवार का त्याग छिपा है। राजनांदगांव की इस अंतरराष्ट्रीय भारोत्तोलक ने 2022 से लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीतकर अपनी पहचान बनाई है। उनका यह रजत पदक उनके करियर की एक और बड़ी उपलब्धि है। ज्ञानेश्वरी की खेल यात्रा एक साधारण व्यायामशाला से शुरू हुई, जहां उनके पिता दीपक यादव ने उन्हें भारोत्तोलन सिखाने का निर्णय लिया। दीपक खुद बाडी बिल्डिंग करते थे और उन्होंने अपनी बेटी की प्रतिभा को पहचानते हुए उसे कोच अजय लोहार के पास भेजा। इस तरह ज्ञानेश्वरी ने अपने करियर की शुरुआत की और आज वह एक सफल भारोत्तोलक बन चुकी हैं।
ज्ञानेश्वरी के परिवार ने आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए उनकी ट्रेनिंग को प्राथमिकता दी। दीपक यादव एक इलेक्ट्रिशियन हैं और उनकी मासिक आय सीमित है, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी बेटी की डाइट और ट्रेनिंग पर ध्यान दिया। परिवार ने कई बार अपनी जरूरतों को टालकर ज्ञानेश्वरी के प्रशिक्षण में कोई कमी नहीं आने दी। दीपक रोजाना अपने बच्चों को साइकिल पर स्कूल और व्यायामशाला लेकर जाते थे, और रात में सभी एक ही साइकिल पर घर लौटते थे। ज्ञानेश्वरी की मां दुर्गा यादव ने सीमित संसाधनों में परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए हर दिन की तैयारी की चिंता की। दीपक ने कई बार 20-20 घंटे काम किया, लेकिन बेटी की तैयारी में कभी समझौता नहीं किया। उनका विश्वास था कि संघर्ष ही उनकी बेटी की सबसे बड़ी ताकत बनेगा।









