Coal Corridor Crisis: कोयलांचल में बच्चों की जान खतरे में

चतरा जिले के टंडवा से लेकर रामगढ़ और धनबाद के कोयलांचल तक की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां की सड़कें अब कोयला ढोने वाले भारी वाहनों के लिए समर्पित हो चुकी हैं,
चतरा जिले के टंडवा से लेकर रामगढ़ और धनबाद के कोयलांचल तक की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां की सड़कें अब कोयला ढोने वाले भारी वाहनों के लिए समर्पित हो चुकी हैं, जिससे आम नागरिकों, बुजुर्गों और बच्चों का चलना मुश्किल हो गया है। सुबह होते ही सड़कों पर शिक्षा की उम्मीदें नहीं, बल्कि कोयले से लदे ट्रकों की लंबी कतारें नजर आती हैं। बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ और दिल में हर पल हादसे का डर, यही झारखंड के इन इलाकों की रोजमर्रा की सुबह है। चतरा के टंडवा और सिमरिया का यह दर्द केवल एक जिले की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे झारखंड के कोयलांचल की बानगी है। रामगढ़ में कुज्जू, पतरातू और गोला मार्ग पर कोयले ओवरलोडेड हाइवा और डंपरों का आतंक चरम पर है। यहां आए दिन सड़क दुर्घटनाओं में आम राहगीरों की जान जा रही है। स्कूल वैन और बसों को इन भारी वाहनों के बीच घंटों जाम से जूझना पड़ता है। कोयला राजधानी धनबाद का हाल तो और बुरा है। गोविंदपुर, कतरास, बाघमारा और सिंदरी क्षेत्र की सड़कें गड्ढों और कोयले की काली धूल से भरी हुई हैं। अवैध और बेलगाम कोयला परिवहन ने स्थानीय लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। हवा में उड़ता कोयला और सड़क पर दौड़ते मौत के सौदागर, बच्चों के फेफड़ों और जिंदगी दोनों पर भारी पड़ रहे हैं। हाई कोर्ट में भी इस मामले की सुनवाई चल रही है। जनता का यह दर्द अब सदन से लेकर सचिवालय तक गूंजने लगा है। हाल ही में स्थानीय सांसद कालीचरण सिंह ने लोकसभा में इस गंभीर मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि टंडवा और सिमरिया क्षेत्र में कोल वाहनों के कारण आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। इन पर लगाम कसने और जनजीवन बचाने के लिए कोयला परिवहन के वास्ते अलग डेडिकेटेड कॉरिडोर का निर्माण अब अनिवार्य हो गया है। विधायक कुमार उज्ज्वल दास ने भी इस मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य के मुख्य सचिव और वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने कोयला परिवहन के इस नासूर का स्थाई निदान निकालने की जोरदार मांग की है। झारखंड के कोयलांचल में यह सब किसी से छिपा नहीं है। प्रशासनिक सुस्ती और मिलीभगत के साए में कोयला सिंडिकेट का एक बहुत बड़ा और खतरनाक खेल चल रहा है। यह सिंडिकेट इतना ताकतवर है कि आम जनता की जान इसकी प्राथमिकता सूची में दूर-दूर तक नहीं है। मुनाफाखोरी का यह तंत्र हर दिन मासूमों की जिंदगी दांव पर लगा रहा है। ज्यादातर कोयला खनन क्षेत्रों में खाकी, खादी और मीडिकर्मी मिले होते हैं। जिंदगी की कीमत कोयले के हर टन से भारी है। जब तक सियासत और सिंडिकेट की सांठगांठ नहीं टूटेगी, तब तक सड़कों पर यूं ही लहू बहता रहेगा। इस समस्या से पार पाने के लिए कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि ग्राउंड जीरो पर कड़े फैसलों की दरकार है। अब वक्त आ गया है कि सरकार और प्रशासन सिर्फ मुआवजे के मरहम लगाने के बजाय, इस व्यवस्थागत बीमारी का स्थाई ऑपरेशन करें, ताकि झारखंड के बच्चे सुरक्षित सड़क पर चल सकें और उनका भविष्य अंधकार में न डूबे।









