Court Orders 82-Year-Old Man to Return to Jail: 40 साल बाद भाई की हत्या के मामले में सजा पूरी करेगा बुजुर्ग

प्रयागराज से एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय सामने आया है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1984 में अपने भाई की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए 82 वर्षीय बाबूलाल काछ
प्रयागराज से एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय सामने आया है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1984 में अपने भाई की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए 82 वर्षीय बाबूलाल काछी की अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि बाबूलाल को तुरंत जेल भेजा जाए ताकि वह अपनी बाकी बची सजा काट सके। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि उम्र और लंबे समय बाद जेल जाने की पीड़ा के बावजूद सजा को कम नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट की तरह अनुच्छेद 142 की शक्तियां नहीं हैं, जिसके तहत सजा में छूट दी जा सके। इस मामले में, सेशन कोर्ट ने 11 अक्टूबर 1984 को बाबूलाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, बाबूलाल ने 25 मार्च 1984 को अपने बड़े भाई गंगा की हत्या की थी। घटना के समय, बाबूलाल ने पीछे से साबरी से गंगा के सिर पर 3-4 बार वार किया, जिससे गंगा की मौके पर ही मौत हो गई। बाबूलाल की पत्नी ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, लेकिन वह भी घायल हो गई। मृतक की बहन रानी ने साबरी को छीनकर पुलिस को सौंपा, लेकिन उसका बयान कोर्ट में नहीं लिया गया। बाबूलाल ने अपनी अपील में कहा कि हत्या का इरादा साबित नहीं हुआ और साबरी केवल एक कृषि का औजार था, न कि हत्या का हथियार। बाबूलाल ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ने सबसे महत्वपूर्ण गवाह रानी का बयान नहीं लिया, जो उनकी गलती थी।
हालांकि, खंडपीठ ने बाबूलाल की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि गंगा पर किए गए वार स्पष्ट रूप से हत्या के इरादे से थे। कोर्ट ने कहा कि अगर इरादा केवल चोट पहुंचाने का होता, तो हमलावर शरीर के गैर-जरूरी हिस्से पर वार करता। इस मामले में, बाबूलाल ने जानबूझकर गंगा की हत्या की, इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उसकी दोषसिद्धि सही है। न्यायालय ने यह भी कहा कि बाबूलाल की उम्र 82 वर्ष है और 40 साल बाद उसे जेल जाना पड़ेगा, यह बात कोर्ट को विचलित करती है, लेकिन इसके पास कोई विकल्प नहीं है। कोर्ट ने बाबूलाल के जमानत बांड को रद्द कर दिया और उसे संबंधित कोर्ट में तुरंत समर्पण करने का आदेश दिया। यदि वह समर्पण नहीं करता है, तो संबंधित कोर्ट गैर-जमानती वारंट जारी करेगा।









