Court Verdict After 20 Years: पटना हाईकोर्ट ने सभी अभियुक्तों को दोषी ठहराया

पटना। भागलपुर जिले के जगदीशपुर थाना क्षेत्र में वर्ष 2006 में हुए चर्चित गोलीकांड के मामले में पटना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी अभियुक्तो
पटना। भागलपुर जिले के जगदीशपुर थाना क्षेत्र में वर्ष 2006 में हुए चर्चित गोलीकांड के मामले में पटना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी अभियुक्तों को दोषी करार दिया है। न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने घायल प्रत्यक्षदर्शी की विश्वसनीय गवाही और चिकित्सीय साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। इसके कारण अभियुक्तों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया था, जो कि न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह मामला 18 नवंबर 2006 का है, जब भागलपुर के खिरीबांध गांव स्थित मजार की भूमि पर विद्यालय निर्माण को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ था। इस विवाद के दौरान चांद आलम उर्फ मनु ने घायल सम्स तबरेज को पकड़कर जमीन पर गिरा दिया और उसके बाद शमशेर उर्फ सम्सुल मिस्त्री को गोली चलाने का आदेश दिया। गोली सम्स तबरेज की पीठ में लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना के बाद जगदीशपुर थाना में कांड संख्या 274/2006 दर्ज किया गया था। सत्र न्यायालय, भागलपुर ने 11 जनवरी 2018 को सभी अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने पटना हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी। अब हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी अभियुक्तों को दोषी ठहराया है।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को कानून में विशेष महत्व प्राप्त है। यदि उसकी गवाही विश्वसनीय हो और चिकित्सीय साक्ष्यों से पुष्ट होती हो, तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित पक्ष का रिश्तेदार है। अदालत ने पाया कि घायल सम्स तबरेज की गवाही एफआईआर से लेकर मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान एक समान रही। खंडपीठ ने यह भी कहा कि डॉक्टर की रिपोर्ट में निकट दूरी से गोली लगने की पुष्टि हुई है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवेचना में कुछ कमियां, जैसे गोली या हथियार की बरामदगी नहीं होना अथवा कुछ पुलिस अधिकारियों का गवाही के लिए पेश नहीं होना, अपने आप में अभियोजन के पूरे मामले को अविश्वसनीय नहीं बनाता। यदि प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और चिकित्सीय साक्ष्य भरोसेमंद हों, तो केवल जांच की कमियों के आधार पर अभियुक्तों को बरी नहीं किया जा सकता।









