Crowd Control Strategies: भारत और पश्चिमी देशों की रणनीतियों में अंतर

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लोकतांत्रिक समाज में विरोध-प्रदर्शन एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब ये प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर लेते हैं, तो कानून-व्यवस्था बनाए रख
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लोकतांत्रिक समाज में विरोध-प्रदर्शन एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब ये प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर लेते हैं, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे हालात से निपटने के लिए भारत और पश्चिमी देशों ने अपने-अपने संदर्भ में अलग-अलग रणनीतियाँ विकसित की हैं। दोनों का मुख्य उद्देश्य जान-माल का नुकसान रोकना और स्थिति पर जल्दी काबू पाना है, लेकिन भीड़ को नियंत्रित करने के तरीके, इस्तेमाल होने वाले उपकरण और बल प्रयोग की रणनीति में स्पष्ट भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। भारत में दंगा नियंत्रण की प्रक्रिया पुलिसकर्मियों की सुरक्षा से शुरू होती है। उन्हें हेलमेट, फेस वाइजर, बॉडी प्रोटेक्टर, पॉलीकार्बोनेट शील्ड जैसे सुरक्षा उपकरण प्रदान किए जाते हैं ताकि वे पथराव, आगजनी या धारदार हथियारों के हमलों से सुरक्षित रह सकें। जब स्थिति बिगड़ती है, तो कार्रवाई भी चरणबद्ध तरीके से की जाती है। पहले सार्वजनिक चेतावनी दी जाती है, उसके बाद वाटर कैनन, आंसू गैस और पेपर आधारित पीएवीए शेल का उपयोग किया जाता है। हाल के वर्षों में, लंबे दूरी तक तेज ध्वनि उत्पन्न करने वाले एलआरएडी (Long Range Acoustic Device) जैसे आधुनिक उपकरण भी सुरक्षा बलों के पास उपलब्ध हो गए हैं। यदि इसके बाद भी भीड़ हिंसक बनी रहती है, तो एंटी-रायट गन जैसे अंतिम विकल्पों का सहारा लिया जाता है। इन उपकरणों के उपयोग के लिए दूरी, निशाना और अन्य सुरक्षा मानकों को निर्धारित किया गया है, ताकि गंभीर चोट की संभावना कम हो सके।
अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में रणनीति का केंद्र पूरी भीड़ को तितर-बितर करने के बजाय हिंसा कर रहे व्यक्तियों पर नियंत्रित कार्रवाई करना होता है। वहां स्पंज ग्रेनेड, बीन बैग शॉटगन और पेपर-बॉल लॉन्चर जैसे उपकरणों का अधिक उपयोग किया जाता है, जिनका प्रभाव सीमित दायरे में होता है। टियर गैस और एलआरएडी जैसे उपकरण वहां भी उपलब्ध हैं, लेकिन धातु के पेलेट आधारित हथियारों का उपयोग लगभग नहीं किया जाता। अमेरिका में वाटर कैनन सामान्य पुलिस कार्रवाई का हिस्सा नहीं हैं, जबकि जर्मनी जैसे कुछ देशों में उनका उपयोग अब भी किया जाता है। भारत में कई बार हजारों की संख्या में लोग सीमित स्थानों पर एकत्र होते हैं। ऐसे प्रदर्शनों में असामाजिक तत्वों के शामिल होने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए यहां पुलिस की तैयारी बड़े पैमाने पर भीड़ को नियंत्रित करने के हिसाब से होती है। इसके विपरीत, पश्चिमी देशों में अपेक्षाकृत छोटे समूहों, बेहतर निगरानी व्यवस्था और तकनीकी सहायता के कारण पुलिस व्यक्तिगत स्तर पर कार्रवाई को प्राथमिकता देती है।









