School Infrastructure Issues: दिल्ली के 774 स्कूलों की स्थिति चिंताजनक

रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। राजस्थान के झालावाड़ में स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हादसे के बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्
रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। राजस्थान के झालावाड़ में स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हादसे के बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को सरकारी स्कूलों की इमारतों का सुरक्षा ऑडिट कराने, जर्जर भवनों की पहचान कर तत्काल कार्रवाई करने और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। दिल्ली में भी स्कूल भवनों की मरम्मत, आधारभूत सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए। हालांकि, एक साल बाद भी राजधानी के सरकारी स्कूलों की तस्वीर पूरी तरह नहीं बदली है। हाल की रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करती है कि राजधानी के 108 सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल भवन असुरक्षित पाए गए हैं। इनमें 54 भवन बेहद जर्जर हैं, जबकि सात भवनों को ध्वस्त करने की मंजूरी मिल चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर बच्चों की सुरक्षा के दावों का असर जमीन पर कब दिखाई देगा। दिल्ली सरकार की समीक्षा में सामने आया कि जिन 108 भवनों को असुरक्षित या खतरनाक श्रेणी में रखा गया है, उनमें कई इमारतें 30 से 40 वर्ष पुरानी हैं। निरीक्षण में कई स्कूलों में दीवारों और छतों में दरारें, उखड़ता प्लास्टर, जर्जर ब्लॉक, खिड़की-दरवाजों की खराब स्थिति, पुराने शौचालय और टिन शेड के नीचे चल रही कक्षाएं सामने आई हैं। कुछ भवन इतने खराब हालात में हैं कि उनके पुनर्निर्माण या ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी है। सरकार ने इन भवनों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने और चरणबद्ध तरीके से मरम्मत व पुनर्निर्माण का निर्णय किया है। स्कूल भवनों की बदहाली को लेकर सरकार पहले भी सक्रियता दिखा चुकी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सभी सरकारी स्कूलों का व्यापक स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने के निर्देश दिए हुए हैं। समीक्षा बैठकों में पेयजल, शौचालय, बिजली व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा, भवनों की मजबूती और परिसर की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई। सरकार ने असुरक्षित भवनों को हटाकर उनकी जगह आधुनिक और भूकंपरोधी बहुमंजिला स्कूल भवन विकसित करने की योजना भी बनाई है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों को लेकर सरकारी अधिकारियों की उदासीनता कितनी है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जो स्कूल बन रहे हैं, वे 15-16 साल तक ही नहीं चल पा रहे हैं। इसका उदाहरण बाहरी दिल्ली के चांदपुर खुर्द स्कूल का है। वर्ष 2000 में गांव चांदपुर खुर्द और चांदपुर कला स्थित नगर निगम विद्यालय की इमारत का निर्माण हुआ था। वर्ष 2016 में भवन को जर्जर और खतरनाक घोषित कर दिया गया। इसके बाद विद्यार्थियों की सुरक्षा को देखते हुए मुख्य भवन का उपयोग बंद कर दिया गया। पिछले करीब दस वर्षों तक स्कूल परिसर में बने एक हाल में ही पढ़ाई कराई जाती रही। इससे बच्चे कैसे पढ़ रहे होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसी ही स्थिति बिंदापुर गांव स्थित निगम प्राथमिक विद्यालय की दो मंजिला इमारत की है, जो आज किसी भूतिया खंडहर जैसी नजर आती है। स्कूल बंद होने के बाद बच्चों और शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में शिफ्ट कर दिया गया। बिंदापुर में वर्ष 2016 में इमारत को असुरक्षित मानकर स्कूल को बंद कर दिया गया था। 2018 में इसे आधिकारिक तौर पर 'जर्जर' घोषित कर दिया गया था। सरकार की नीतियां और दावे कहते हैं कि हर बच्चे को उसके घर के नजदीक ही प्राथमिक शिक्षा की सुविधा मिलनी चाहिए। मगर जमीनी हकीकत इसके उलट है। बच्चे धूल फांकते रास्तों से होकर दूसरे इलाकों के स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं। इसी प्रकार एमसीडी का ओखला स्थित सह-शिक्षा स्कूल है, जहां कई कमरे टीन शेड टूटने और जर्जर होने की वजह से बंद हैं। बच्चों को सीमित कक्षाओं में पढ़ाया जा रहा है, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। पिछले साल की तरह इस बार भी मानसून में जलजमाव के कारण किराड़ी के मुबारकपुर डबास के सरकारी स्कूल में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई। जलजमाव के कारण स्कूल के भीतर आने व जाने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा तो बेंच लगाकर वैकल्पिक रास्ता बनाया गया। बेंच के ऊपर चलकर ही आवाजाही हुई। पिछले वर्ष भी स्कूल में मानसून की वर्षा के दौरान पानी भर गया था और इसी तरह की स्थिति देखने को मिली थी। अब एक वर्ष के बाद भी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ।









