Facial Recognition in CJP Protest: क्या यह तकनीक सही है?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा आयोजित प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। छात
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा आयोजित प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। छात्रों और युवाओं के इस प्रदर्शन में इस तकनीक के उपयोग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बिना किसी स्पष्ट कानून के प्रदर्शनकारियों की निगरानी करना नागरिकों की प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा का सीधा उल्लंघन है। भारत में कानून लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और फेशियल रिकग्निशन तकनीक का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने निगरानी के लिए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम और ड्रोन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाया। हालांकि, इन तकनीकों के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए अब तक कोई अलग और व्यापक कानून नहीं है। ऐसे में निजता, जवाबदेही और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा को लेकर सवाल बने हुए हैं।
इस बहस को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फैसला महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने राइट टू प्राइवेसी को संविधान के तहत मौलिक अधिकार माना था। इसके बाद केंद्रीय निगरानी प्रणाली, NATGRID और NETRA जैसी निगरानी प्रणालियों को भी राइट टू प्राइवेसी के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई। केंद्र सरकार का तर्क रहा है कि प्राइवेसी एक पवित्र मौलिक अधिकार है और राज्य इसका सम्मान करता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। सरकार के अनुसार, वैध और महत्वपूर्ण राज्य हित होने पर निजता की सुरक्षा की सीमा तय की जा सकती है। हालांकि, किसी व्यक्ति की निगरानी, संदेशों की कानूनी इंटरसेप्शन या कंप्यूटर में मौजूद जानकारी की निगरानी के लिए अधिकृत एजेंसियों और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जैसी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है।









