GI Tag Benefits for Artisans: जम्मू-कश्मीर के उत्पादों को मिला जीआई टैग

जम्मू-कश्मीर, अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। पिछले कुछ वर्षों में, स्थानीय उत्पादों की गु
जम्मू-कश्मीर, अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। पिछले कुछ वर्षों में, स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता और विशिष्टता को बनाए रखने के लिए जीआई टैग देने की प्रक्रिया में तेजी आई है। जीआई टैग मिलने से न केवल इन उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ी है, बल्कि स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और किसानों की आजीविका को भी नया आयाम मिला है। यह टैग नकली उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने में सहायक है और जीआई क्यूआर-कोड आधारित लेबलिंग तकनीक के माध्यम से ग्राहक उत्पाद की प्रामाणिकता और उसे बनाने वाले कारीगर का विवरण देख सकते हैं। इस प्रक्रिया से उत्पादों का सही मूल्य स्थानीय उत्पादकों तक पहुंचता है और निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं। इस प्रकार, जम्मू-कश्मीर के उत्पादों की देश-विदेश में लोकप्रियता में वृद्धि हुई है, जिससे स्थानीय व्यापारियों में उत्साह का संचार हुआ है।
भारत की संसद ने दिसंबर 1999 में उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण के लिए एक अधिनियम पारित किया था, जिसे 2003 में लागू किया गया। इसके बाद, भारत में विभिन्न उत्पादों को जीआई टैग देने की प्रक्रिया शुरू हुई। कठुआ जिले की बसोहली पेंटिंग, जो अपनी जीवंत रंगों और विशिष्ट चेहरे की बनावट के लिए जानी जाती है, जीआई टैग पाने वाला पहला हस्तशिल्प उत्पाद है। इसके अलावा, राजौरी और पुंछ में चिकरी वुड क्राफ्ट की नक्काशी, डोडा जिले के भद्रवाह राजमा, रामबन जिले का सुलाई शहद, ऊधमपुर का कलाड़ी, अनंतनाग का मुश्कबुदजी चावल, और कश्मीर का केसर जैसे उत्पादों को भी जीआई टैग मिला है। ये सभी उत्पाद अपने विशेष गुणों और स्थानीय पहचान के लिए जाने जाते हैं।









