High Court: कर्मचारी की बर्खास्तगी की वैधता से पहले विभागीय जांच की पवित्रता का परीक्षण जरूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी की वैधता की जांच करने से पहले विभागीय जांच की पवित्रता का परीक्षण कर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी की वैधता की जांच करने से पहले विभागीय जांच की पवित्रता का परीक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि जांच में कोई खोट पाया जाता है, तो नियोक्ता को बिना बचाव का अवसर दिए कर्मचारी को दोषमुक्त घोषित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है। यह निर्णय श्रम कानून के अंतर्गत कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस मामले में नियोक्ता ने हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों का हवाला दिया। नियोक्ता का कहना था कि श्रम न्यायालय ने सुनवाई की प्रक्रिया में गलतियां की हैं। उन्होंने तर्क दिया कि श्रम न्यायालय ने विभागीय जांच की वैधता और आरोपों के गुण-दोष पर एक साथ निर्णय दिया, जबकि पहले केवल विभागीय जांच की निष्पक्षता पर ही निर्णय होना चाहिए था। नियोक्ता ने यह भी कहा कि यदि विभागीय जांच को वैध माना जाता है, तो उसी के आधार पर बर्खास्तगी का निर्णय कायम रहेगा। लेकिन यदि जांच में कोई दोष पाया जाता है, तो नियोक्ता को श्रम न्यायालय के समक्ष स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना अनिवार्य है।
कर्मचारी के अधिवक्ता ने श्रम न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया, जबकि कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि विभागीय जांच निष्पक्ष और विधिसम्मत पाई जाती है, तो सामान्यतः नियोक्ता को अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होती। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्कमैन ऑफ मेसर्स फायरस्टोन टायर एंड रबर कंपनी ऑफ इंडिया (प्रा.) लिमिटेड के मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच की वैधता और निष्पक्षता का प्रश्न हमेशा प्राथमिक मुद्दे के रूप में तय किया जाना चाहिए। इस प्रकार, कोर्ट ने श्रम न्यायालय के विभागीय जांच को अनुचित ठहराने वाले निष्कर्ष को सही माना, लेकिन आरोप सिद्ध न होने के संबंध में निष्कर्ष को कानून के विपरीत बताया।











