Supreme Court Hearing: हिमाचल प्रदेश में कर्मचारी भर्ती और सेवा शर्तें अधिनियम पर सुनवाई

हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है, जिसमें राज्य सरकार द्वारा बनाए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती और सेवा शर्
हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है, जिसमें राज्य सरकार द्वारा बनाए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती और सेवा शर्तें) अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करने के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ चुनौती दी गई है। यह मामला बुधवार को न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। हाईकोर्ट ने इस अधिनियम के तहत कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों को वापस लेने, उनकी वरिष्ठता छीनने और रिकवरी (कटौती) करने संबंधी सभी सरकारी निर्णयों को रद्द कर दिया था। इस निर्णय ने राज्य सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती उत्पन्न कर दी है, क्योंकि इससे कर्मचारियों के अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि सक्षम अधिकारी तीन महीने के भीतर न्यायिक फैसलों के अनुसार पात्र कर्मचारियों को उनके सेवा लाभ प्रदान करें। यह आदेश राज्य विधायिका के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वह अदालतों के फैसलों को पलटने का अधिकार नहीं रखती। हाईकोर्ट ने इस मामले में 25 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया था कि राज्य सरकार को अनुच्छेद 14 का पालन करना चाहिए और सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए।
इसके अलावा, प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को अनुकंपा के आधार पर रोजगार मांगने का अधिकार देने की जानकारी सबसे पहले विभाग की जिम्मेदारी है। यदि विभाग इस संबंध में जानकारी नहीं देता है, तो आश्रित को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने याचिकाकर्ता नवीन कुमार की याचिका को स्वीकार करते हुए भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड द्वारा 24 जून 2025 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता के पिता स्व. अमर सिंह बीबीएमबी में बेलदार के पद पर कार्यरत थे और 2001 में उनका निधन हो गया था। उस समय याचिकाकर्ता केवल 13 वर्ष का था। विभाग ने न तो याचिकाकर्ता और न ही उसकी बहनों को इस अधिकार की जानकारी दी, इसलिए उसकी अर्जी खारिज करना पूरी तरह गलत ठहराया गया।









