India to Restore 240 Temples in Indonesia: भारत 240 ध्वस्त मंदिरों का जीर्णोद्धार करेगा

वीके शुक्ला, नई दिल्ली। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) एक बार फिर से विदेश में भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने जा रहा है। हाल ही में
वीके शुक्ला, नई दिल्ली। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) एक बार फिर से विदेश में भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान, वहां की सरकार ने जावा द्वीप पर स्थित विश्व प्रसिद्ध प्रम्बानन हिंदू मंदिर परिसर के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए भारत से सहयोग का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के बाद एएसआई ने इस ऐतिहासिक परियोजना की तैयारी शुरू कर दी है। जल्द ही एएसआई की एक तीन सदस्यीय विशेषज्ञ टीम इंडोनेशिया का दौरा करेगी, जिसका उद्देश्य संरक्षण कार्य का प्रारंभिक आकलन करना है।
प्रम्बानन मंदिर परिसर को केवल इंडोनेशिया ही नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर माना जाता है। इसका निर्माण लगभग 850 ईस्वी में संजय (माताराम) राजवंश के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित है। वर्ष 1991 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर सूची में शामिल किया था। मूल रूप से इस परिसर में 240 मंदिर थे, लेकिन भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण इनमें से अधिकांश ध्वस्त हो चुके हैं। वर्तमान में मुख्य मंदिरों के अलावा बड़ी संख्या में मंदिरों के पत्थर और स्थापत्य अवशेष सुरक्षित रखे गए हैं।
इन अवशेषों को वैज्ञानिक पद्धति से उनकी मूल स्थिति में स्थापित करना एएसआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। मंदिर परिसर में मौजूद पत्थरों पर रामायण और महाभारत के प्रसंग अत्यंत बारीकी से उकेरे गए हैं, जिन्हें भारतीय संस्कृति और प्राचीन शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। विशेषज्ञों को बिखरे हुए पत्थरों की पहचान कर उनके मूल स्थान का निर्धारण करते हुए पुनर्स्थापन का कार्य करना होगा, जो पुरातात्विक और स्थापत्य दृष्टि से बेहद जटिल माना जाता है। भारत इससे पहले भी कई देशों में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में तकनीकी सहयोग दे चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंडोनेशिया में एएसआई की यह परियोजना केवल एक मंदिर के पुनर्स्थापन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारतीय पुरातत्व, संरक्षण तकनीक और स्थापत्य विशेषज्ञता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान भी दिलाएगी। साथ ही, इससे भारत और इंडोनेशिया के बीच सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंध और मजबूत होंगे।









