Inspiring Journey: दो साल की उम्र में खोई आंखों की रोशनी, बांसुरी के सुरों ने दी नई पहचान

बिलासपुर जिले के गांव लेठवीं के 56 वर्षीय राज कुमार ने अपनी जिंदगी की कठिनाइयों को मात देते हुए एक नई पहचान बनाई है। महज दो साल की उम्र में बीमारी के कारण उनकी
बिलासपुर जिले के गांव लेठवीं के 56 वर्षीय राज कुमार ने अपनी जिंदगी की कठिनाइयों को मात देते हुए एक नई पहचान बनाई है। महज दो साल की उम्र में बीमारी के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। राज कुमार ने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया और बांसुरी वादन के माध्यम से न केवल अपने जीवन को संवारने का प्रयास किया, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गए। उनकी बांसुरी की मधुर तान सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। राज कुमार का मानना है कि इंसान की सोच और आत्मविश्वास ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। उन्होंने अपने हुनर को पहचानते हुए बिना किसी औपचारिक शिक्षा के बांसुरी बजाना सीखा और आज वे इस कला के जरिए अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
राज कुमार की कहानी केवल एक दिव्यांग व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह संघर्ष और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, बल्कि अपने हुनर को अपनी पहचान बनाया। उनकी बांसुरी की धुनें कभी भक्ति का एहसास कराती हैं, तो कभी पहाड़ों की सादगी और जीवन के संघर्ष की कहानी बयां करती हैं। राज कुमार का कहना है कि भगवान ने उनकी आंखें ले लीं, लेकिन बांसुरी का वरदान दिया, जिससे वे लोगों को खुश कर सकते हैं। उनका मानना है कि जीवन में हर अंधेरा हौसले और मेहनत की रोशनी से दूर किया जा सकता है।
राज कुमार आज मंदिरों, धार्मिक आयोजनों, मेलों और सामाजिक कार्यक्रमों में बांसुरी बजाकर अपनी आजीविका कमा रहे हैं। उनकी मेहनत से होने वाली आमदनी से उनका परिवार चलता है। राज कुमार की कहानी समाज के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है। वे साबित करते हैं कि दिव्यांगता केवल शरीर में नहीं, बल्कि सोच में होती है। उनकी बांसुरी की धुनें न केवल उन्हें पहचान दिलाती हैं, बल्कि यह संदेश भी देती हैं कि अगर मन में हौसला हो, तो कोई भी कमी मंजिल तक पहुंचने में बाधा नहीं बन सकती।









