Inspiring Journey of Jhandu Kumar: झंडू कुमार की प्रेरणादायक यात्रा

पटना से आए पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने हाल ही में कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर न केवल बिहार का नाम रोशन किया, बल्कि अपने संघर्ष की कहानी से भी लाखों ल
पटना से आए पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने हाल ही में कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर न केवल बिहार का नाम रोशन किया, बल्कि अपने संघर्ष की कहानी से भी लाखों लोगों को प्रेरित किया है। झंडू का असली नाम अविनाश कुमार था, लेकिन एक बचपन की घटना ने उनकी पहचान को हमेशा के लिए बदल दिया। महज पांच साल की उम्र में उन्हें पोलियो हो गया, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। इलाज के लिए परिवार की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई और आसपास के लोग उन्हें ताने मारने लगे। धीरे-धीरे लोग उन्हें 'झंडू' कहकर बुलाने लगे और यही नाम उनकी पहचान बन गया। झंडू ने बताया कि एक समय उन्होंने अपना नाम बदलने का भी प्रयास किया, लेकिन सरकारी दफ्तर में उनका नाम सुनकर कर्मचारी हंसने लगे। उन्होंने कहा, "अब यही मेरी पहचान है और मैंने इसी नाम को अपना लिया।" झंडू कुमार ने अपने संघर्ष को याद करते हुए कहा कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने हर तरह का काम किया। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बताया कि कभी सब्जी बेची, कभी सवारी ढोई, और दिनभर मेहनत करके 200 से 400 रुपये तक कमाते थे। इसी से पूरे परिवार का खर्च चलता था। जिम में ट्रेनर द्वारा दी गई सलाह के अनुसार बेहतर डाइट लेने की कोशिश की, लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण यह संभव नहीं हो सका। झंडू ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, भाई और दोस्तों को दिया। उन्होंने कहा कि अगर परिवार और दोस्तों का सहयोग नहीं मिलता, तो शायद वह यहां तक नहीं पहुंच पाते। आर्थिक सहयोग की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि मेहनत तो हर खिलाड़ी करता है, लेकिन संसाधनों की कमी कई सपनों को अधूरा छोड़ देती है। झंडू कुमार ने बताया कि उन्हें बॉडीबिल्डिंग का शौक अभिनेता सलमान खान की फिल्मों को देखकर लगा। फिल्मों में उनकी फिटनेस देखकर उन्होंने भी जिम जाने का फैसला किया। पहले उन्हें संकोच होता था कि दिव्यांग होकर जिम कैसे जाएं, लेकिन बाद में एक दोस्त के साथ जाना शुरू किया। धीरे-धीरे बाइसेप्स और ट्राइसेप्स बनाने का शौक बढ़ा और फिटनेस उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई। झंडू कुमार ने बताया कि वर्ष 2018 में उन्हें पहली बार पैरा खेलों के बारे में जानकारी मिली। शुरुआत में उन्होंने शॉटपुट और डिस्कस थ्रो में हाथ आजमाया, लेकिन बाद में पैरा पावरलिफ्टिंग को अपना खेल चुना। लगातार मेहनत और संघर्ष के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बनाई और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर बिहार का गौरव बढ़ाया। झंडू कुमार की कहानी इस बात का प्रमाण है कि सीमित संसाधन, आर्थिक तंगी और सामाजिक ताने भी उस व्यक्ति का रास्ता नहीं रोक सकते, जिसके भीतर अपने सपनों को पूरा करने का जुनून हो। आज उनकी सफलता उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो परिस्थितियों को अपनी कमजोरी मान बैठते हैं।









