Infrastructure Concerns: कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे 13 दिन में धंस गया

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का एक हिस्सा, जो कि 4200 करोड़ रुपये की लागत से बना था, केवल 13 दिनों के भीतर ही धंस गया है। इस घटना ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और तकन
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का एक हिस्सा, जो कि 4200 करोड़ रुपये की लागत से बना था, केवल 13 दिनों के भीतर ही धंस गया है। इस घटना ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और तकनीकी मानकों पर सवाल उठाए हैं। 25 जुलाई को सड़क धंसने की घटना सामने आई थी, जो कि गंगा एक्सप्रेसवे के एक हिस्से में भी हाल ही में देखी गई समस्याओं के समान है। यह एक्सप्रेसवे हाल ही में खोला गया था और इसके निर्माण में उपयोग की गई तकनीक की विशेषताएँ भी बताई गई थीं। इससे पहले दिल्ली-देहरादून और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे पर भी इसी तरह की समस्याएँ देखी जा चुकी हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करते समय कहा था कि इसे ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन (एआइएमजीसी) तकनीक से बनाया गया है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का दावा है कि यह तकनीक अमेरिका और जर्मनी के बाद भारत में पहली बार उपयोग की गई है। हालांकि, अब सवाल उठता है कि इतनी महंगी तकनीक और निवेश के बावजूद सड़क एक हल्की बारिश भी क्यों नहीं सहन कर सकी। दैनिक जागरण ने इस मुद्दे पर विशेषज्ञों से बात की है ताकि यह समझा जा सके कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्यदायी संस्थाओं द्वारा गुणवत्ता और निगरानी का ध्यान नहीं रखा गया, तो सड़कों के धंसने और डामर उखड़ने की घटनाएँ जारी रहेंगी। कंपनियाँ प्रोजेक्ट हासिल करने के लिए सबसे कम बोली लगाती हैं, लेकिन बाद में लागत में कटौती करने के लिए सस्ते इंजीनियरों को नियुक्त करती हैं, जिनका कामकाज गुणवत्ता के मानकों पर खरा नहीं उतरता। एनएचएआई ने पीएनसी कंपनी को इस प्रोजेक्ट का टेंडर दिया था, लेकिन ऐसा लगता है कि अर्थ वर्क, कांपैक्टिंग और ड्रेनेज सिस्टम में अनदेखी की गई है, जिसके कारण सड़क धंस गई। एआइएमजीसी तकनीक का उपयोग केवल सड़क को समतल और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किया जाता है। यदि अर्थ वर्क ठीक से नहीं किया गया है, तो सड़क का धंसना निश्चित है। कोई भी तकनीक यह सुनिश्चित नहीं कर सकती कि मिट्टी की परतों पर सही तरीके से कांपैक्टर चलाया गया या नहीं। इस मामले में अनुभव ही महत्वपूर्ण होता है। जिम्मेदार लोगों को इसकी निगरानी करनी चाहिए ताकि निर्माण कार्य सही तरीके से हो सके। लोक निर्माण विभाग के सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता एनराम का कहना है कि सड़कें मजबूत बनाने के लिए अर्थ वर्क सबसे आवश्यक है। मिट्टी पर कांपैक्टर हर 25 से 30 सेंटीमीटर पर चलाना चाहिए और पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। यदि कांपैक्टर सही से चलता है, तो मिट्टी स्वाभाविक रूप से समायोजित हो जाती है और सड़क धंसने और दरारें पड़ने की संभावना कम हो जाती है। एनराम की बात को आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम के महाप्रबंधक सेवानिवृत्त संदीप गुप्ता का कहना है कि निर्माण में गुणवत्ता और निगरानी बेहद आवश्यक है। कंपनियाँ अक्सर इन्हीं चीजों पर कटौती करती हैं। एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए अच्छे सलाहकार की भी आवश्यकता होती है।









