Maoist Leader's Rise and Fall: झारखंड में माओवाद के उदय से अस्त तक का साक्षी है मिसिर बेसरा

प्रमोद चौधरी, गिरिडीह। झारखंड के गिरिडीह और धनबाद की सीमा पर पुलिस की गिरफ्त में आए एक करोड़ रुपये के इनामी माओवादी मिसिर बेसरा ने राज्य में माओवाद के उदय से ले
प्रमोद चौधरी, गिरिडीह। झारखंड के गिरिडीह और धनबाद की सीमा पर पुलिस की गिरफ्त में आए एक करोड़ रुपये के इनामी माओवादी मिसिर बेसरा ने राज्य में माओवाद के उदय से लेकर उसके अस्त तक की कहानी को अपने जीवन में समेटा है। वह धनबाद के पीके राय कॉलेज में एमए की पढ़ाई के दौरान ही माओवाद की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हो गया था। उसके बाद से उसने लगभग चार दशकों तक बिहार, बंगाल, ओडिशा सहित कई राज्यों में आतंक का पर्याय बनकर काम किया। अंततः वह केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर चल रहे माओवाद विरोधी अभियान का शिकार बन गया और अपने ही गढ़ में पकड़ा गया।
मिसिर बेसरा, जो गिरिडीह के पीरटांड़ थाना क्षेत्र के मदनडीह का निवासी है, भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो का सदस्य है। उसके खिलाफ सरकार ने एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया था। उसके ऊपर हत्या, आईईडी ब्लास्ट, पुलिस पर हमले और आर्म्स एक्ट के तहत डेढ़ सौ से ज्यादा मामले दर्ज हैं। सारंडा, कोल्हान और पारसनाथ ओडिशा-बंगाल उसके मुख्य कार्यक्षेत्र रहे हैं। 2003-04 में पश्चिम सिंहभूम के बिटकिलसोय और बलिबा में आईईडी ब्लास्ट की साजिश भी उसी ने रची थी, जिसमें 55 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए थे। 2009 में उसने बिहार के लखीसराय कोर्ट में दिनदहाड़े हमला कर नक्सलियों को छुड़ाने की योजना बनाई थी।
मिसिर बेसरा गिरिडीह जिले में हुए सभी बड़े माओवादी कांडों का मास्टरमाइंड रहा है। उसने लगभग चालीस वर्ष पहले अपने गांव को छोड़कर माओवादी गतिविधियों में शामिल होने का निर्णय लिया था। उस समय पीरटांड़ क्षेत्र में लालखंड की आग की लौ पहले से ही जल रही थी। वह भाकपा माओवादी संगठन में विलय का सूत्रधार भी माना जाता है। उसकी गतिविधियों ने न केवल झारखंड बल्कि आस-पास के राज्यों में भी माओवादी आंदोलन को एक नई दिशा दी। अब जब वह पुलिस की गिरफ्त में है, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह माओवादी आंदोलन का अंत है या फिर इसकी जड़ें अभी भी गहरी हैं।











