Police Action Controversy: बिना नेम टैग लाठीचार्ज की वैधता पर सवाल

20 मई को जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा की गई लाठीचार्ज की घटना ने एक बार फिर से पुलिस की पहचान और उसके कार्यों की वैधता पर सवाल उठाए है
20 मई को जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा की गई लाठीचार्ज की घटना ने एक बार फिर से पुलिस की पहचान और उसके कार्यों की वैधता पर सवाल उठाए हैं। इस घटना में कुछ पुलिसकर्मी बिना नेम टैग के नजर आए और कुछ सादे कपड़ों में थे, जिससे यह चर्चा शुरू हुई कि क्या कानून के अनुसार पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 36 के अनुसार, किसी भी पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार करने के दौरान अपनी पहचान स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करनी चाहिए। यह नियम केवल पहचान बताने के लिए नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए भी है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ गलत व्यवहार होता है, तो वह संबंधित पुलिसकर्मी की पहचान कर सके। इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदान बी. लोकुर ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि बिना नेम टैग वाले पुलिसकर्मियों का प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज करना पूरी तरह से गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस कमिश्नर को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों बनी। इसके अलावा, उन्होंने कानून, प्रशासनिक नियमों और मानवाधिकार आयोग के निर्देशों की भी चर्चा की।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने पुलिस की तैनाती के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए कहा कि कुछ मामलों में पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में तैनात हो सकते हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने यह सवाल उठाया कि यदि सिविल ड्रेस में पुलिसकर्मी खुफिया ड्यूटी पर थे, तो उनके हाथ में लाठी क्यों थी? उनका मानना है कि ऐसे पुलिसकर्मियों को नाम और रैंक वाली वर्दी में होना चाहिए। इसी तरह, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने भी इस बात पर जोर दिया कि ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारी की पहचान स्पष्ट होना आवश्यक है। उनका कहना है कि प्रदर्शन के दौरान यदि बल प्रयोग किया जाता है, तो यह जानना जरूरी है कि सामने मौजूद व्यक्ति पुलिस अधिकारी है। इससे जवाबदेही तय करने में मदद मिलती है।









