Rebellion in Badaun SP: 5 lakh Muslim population, yet no representation...

बदायूं में समाजवादी पार्टी के भीतर बगावत की आवाजें उठने लगी हैं। जिले में लगभग पांच लाख मुस्लिम और 3.40 लाख यादव मतदाता होने का दावा करते हुए, मुस्लिम समुदाय के
बदायूं में समाजवादी पार्टी के भीतर बगावत की आवाजें उठने लगी हैं। जिले में लगभग पांच लाख मुस्लिम और 3.40 लाख यादव मतदाता होने का दावा करते हुए, मुस्लिम समुदाय के लोगों ने संगठन और चुनावी प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारी के तहत सपा द्वारा हाल ही में घोषित छह विधानसभा अध्यक्षों की सूची में एक भी मुस्लिम नेता को स्थान नहीं दिया गया है, जिससे नाराजगी का माहौल बन गया है। सोशल मीडिया पर पार्टी के समर्थक और पदाधिकारी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं, जो कि पार्टी की पीडीए रणनीति पर भी सवाल उठाते हैं।
समाजवादी पार्टी ने तीन दिन पहले बिसौली से सुरेंद्र पाल सिंह, सहसवान से नवाब सिंह, बिल्सी से देवेंद्र गौतम, बदायूं सदर से अतुल पटेल, शेखूपुर से अशोक यादव और दातागंज से सतीश यादव को विधानसभा अध्यक्ष बनाया है। इन नियुक्तियों में पाल, ठाकुर, गौतम, कुर्मी और यादव समाज को प्रतिनिधित्व मिला, लेकिन मुस्लिम समुदाय का कोई चेहरा शामिल नहीं होने से इंटरनेट मीडिया पर बहस तेज हो गई है। सपा से जुड़े स्वाले चौधरी ने फेसबुक पर लिखा कि जिलाध्यक्ष से लेकर छह विधानसभा अध्यक्षों तक किसी भी पद पर मुस्लिम समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, जबकि जिले में मुस्लिम और यादव मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है।
अनवार खान ने अपनी पोस्ट में कहा कि मुस्लिम समाज को केवल संगठनात्मक पद नहीं, बल्कि अपनी आबादी के अनुपात में विधानसभा टिकट मिलने चाहिए। उनका कहना है कि राजनीतिक भागीदारी और टिकटों में हिस्सेदारी अधिक महत्वपूर्ण है। मोहतशाम सिद्दीकी ने लिखा कि 15 जून को लखनऊ में राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ हुई बैठक में उन्होंने मुस्लिम समाज की भागीदारी का मुद्दा उठाया था, लेकिन नई सूची से यह स्पष्ट होता है कि मुस्लिम समाज को दरकिनार किया जा रहा है। इंटरनेट मीडिया पर 2022 के विधानसभा चुनाव का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें केवल बदायूं सदर से मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट दिया गया था। मुस्लिम समाज के लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें अक्सर ऐसी सीटें दी जाती हैं, जहां जीत की संभावना कम होती है।
लोगों का कहना है कि जब तक पूर्व सांसद सलीम शेरवानी को लोकसभा का टिकट मिलता था, तब तक मुस्लिम समाज को सम्मानजनक भागीदारी का अनुभव होता था। अब संगठन से लेकर लोकसभा और विधानसभा टिकटों तक प्रतिनिधित्व घटने से असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। इंटरनेट मीडिया पर हिस्सेदारी के हिसाब से किन्हीं दो सीटों पर टिकट की मांग भी शुरू हो गई है। इस स्थिति ने समाजवादी पार्टी के भीतर एक नई बहस को जन्म दिया है, जो आगामी चुनावों में पार्टी की रणनीति को प्रभावित कर सकती है।











