Skill Development in Education: कौशल विकास को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की सख्त दरकार

अशोक केडियाल, देहरादून। देश और प्रदेश में कौशल विकास शिक्षा को अब पारंपरिक उच्च शिक्षा की तरह मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। दक्षिण को
अशोक केडियाल, देहरादून। देश और प्रदेश में कौशल विकास शिक्षा को अब पारंपरिक उच्च शिक्षा की तरह मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि रोजगार, स्वरोजगार और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए कौशल शिक्षा को समान महत्व देना अत्यंत आवश्यक है। यदि बीए, बीएससी और बीकाम की तरह कौशल विकास पाठ्यक्रमों को भी समान शैक्षणिक दर्जा दिया जाए और प्रतियोगी परीक्षाओं में इनसे जुड़े प्रश्न शामिल किए जाएं, तो बड़ी संख्या में युवा इस दिशा में आगे आएंगे। सोमवारीय जागरण विमर्श में 'सरकारी कालेजों में व्यावसायिक शिक्षा के प्रति छात्रों के घटते रुझान' विषय पर डीएवी कालेज के रसायन विज्ञान विभागाध्यक्ष एवं कौशल विकास विशेषज्ञ प्रो. प्रशांत सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में कौशल आधारित शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है। इसके बावजूद सरकारी शिक्षा व्यवस्था में इसे अभी भी पारंपरिक विषयों के मुकाबले दूसरा दर्जा प्राप्त है। उन्होंने कहा कि निजी शिक्षण संस्थानों ने उद्योगों की जरूरत के अनुसार आधुनिक व्यवसायिक पाठ्यक्रम शुरू किए हैं और वहां इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, सरकारी संस्थानों में सीटें खाली रह जाती हैं। इसका प्रमुख कारण सामाजिक धारणा, सीमित संसाधन, पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव तथा उद्योगों से कमजोर समन्वय है। प्रो. सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें कौशल विकास पर लगातार जोर दे रही हैं, लेकिन अब इसे नीति स्तर पर शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में लाने की आवश्यकता है। स्कूल शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय, शोध और नवाचार तक कौशल आधारित पाठ्यक्रमों को समग्र रूप से जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही स्थानीय उद्योगों, पर्यटन, कृषि, आयुष, आइटी और सेवा क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित किए जाएं ताकि विद्यार्थियों को पढ़ाई पूरी करते ही रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकें। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्य में कौशल विकास का अलग माडल तैयार करने की आवश्यकता है, जो स्थानीय संसाधनों और उद्योगों की मांग के अनुरूप दक्ष मानव संसाधन तैयार करे। इससे पलायन में कमी आएगी और युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे। प्रदेश में 119 राजकीय महाविद्यालय, 21 अनुदानित महाविद्यालय, 402 उच्च शिक्षण संस्थान, 42 विश्वविद्यालय, 71 आइटीआइ, 69 पालिटेक्निक संस्थान, 95 तकनीकी शिक्षा संस्थान संचालित हैं, जिनमें लगभग 6.12 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। प्रो. सिंह के अनुसार कौशल शिक्षा केवल जरूरी ही नहीं बल्कि सभी विद्यार्थियों के लिए सुलभ भी होनी चाहिए। निजी संस्थानों के उद्योग आधारित पाठ्यक्रमों की फीस लाखों रुपये तक है, जिसे अधिकांश विद्यार्थी वहन नहीं कर सकते। प्रदेश के लगभग 65 प्रतिशत युवा आज भी केवल 1500 रुपये वार्षिक फीस वाले सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में पांच वर्षों के भीतर 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को कौशल विकास से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक इसकी उपलब्धि लगभग पांच प्रतिशत ही रही है। यह स्पष्ट संकेत है कि कौशल शिक्षा को मुख्यधारा में लाने और इसके क्रियान्वयन में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। निजी संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा की मांग अधिक, जबकि सरकारी संस्थानों में सीटें खाली हैं। देश में 75 प्रतिशत से अधिक मांग के मुकाबले केवल 31 प्रतिशत विद्यार्थी ही कौशल शिक्षा से जुड़े हैं। सामाजिक धारणा, समकक्षता का अभाव और पलायन जैसी चुनौतियां भी इसका एक कारण है। आंकड़ा आधारित योजना, विश्लेषण और प्रारंभिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा का विस्तार जरूरी है। प्रशिक्षित शिक्षकों, प्रयोगशालाओं, स्टाफ और प्लेसमेंट व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है। उत्तराखंड की जरूरतों के अनुरूप अलग कौशल विकास माडल तैयार किया जाए।









