Supreme Court's Remarks on Police Custody: पुलिस कस्टडी पर ऐसी शर्तें नहीं थोप सकतीं अदालतें जो जांच को बेअसर कर दें

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आंध्र प्रदेश में एक हिरासत में मौत के मामले में निलंबित पुलिस अधिकारी को पुलिस हिरासत में देने के दौरान कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तों
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आंध्र प्रदेश में एक हिरासत में मौत के मामले में निलंबित पुलिस अधिकारी को पुलिस हिरासत में देने के दौरान कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तों में संशोधन किया है। न्यायालय ने कहा कि जांच में आने वाली बाधाओं को लेकर जांच एजेंसी की आशंकाएं पूरी तरह से जायज हैं। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा हाई कोर्ट के सात जुलाई के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इस फैसले में ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेशों में लगाई गई शर्तों और नियमों में संशोधन किया गया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत की अवधि आरोपित को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने की तारीख से शुरू होगी और यह अवधि सात दिनों तक लागू रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में पूछताछ की प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। पीठ ने कहा कि जहां भी हिरासत में पूछताछ की जाएगी, वहां सीसीटीवी कवरेज और वीडियोग्राफी की आवश्यकता को बरकरार रखा गया है। यह निर्देश इस बात को सुनिश्चित करता है कि पूछताछ की प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायपूर्ण हो। इसके साथ ही, मजिस्ट्रेट द्वारा वकील की उपस्थिति की अनुमति देने वाले निर्देश को भी बरकरार रखा गया है। हालांकि, इसमें यह संशोधन किया गया है कि वकील को केवल पूछताछ स्थल के भीतर ही उपस्थित रहने की अनुमति दी जाएगी, ताकि वह आरोपित को देख सके। लेकिन, किसी भी स्थिति में वकील को जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान आरोपित के अधिकारों की रक्षा के प्रति गंभीर है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि जांच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। यह फैसला न केवल आंध्र प्रदेश में बल्कि पूरे देश में पुलिस हिरासत और पूछताछ की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करेगा। न्यायालय का यह कदम यह दर्शाता है कि वह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस प्रकार के निर्णय से यह उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में भी न्यायालय इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएगा।









