World Hepatitis Day: कौन हैं डॉ. MS खुरू? जिन्होंने बदली चिकित्सा जगत की दिशा, हेपेटाइटिस-E की खोज से मिली ग्लोबल पहचान

रोहित जंडियाल, जम्मू। कभी-कभी जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो व्यक्ति को इतिहास में अमर बना देती हैं। ऐसा ही कुछ हुआ विश्व प्रसिद्ध डॉ. मोहम्मद सुल्तान खुर
रोहित जंडियाल, जम्मू। कभी-कभी जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो व्यक्ति को इतिहास में अमर बना देती हैं। ऐसा ही कुछ हुआ विश्व प्रसिद्ध डॉ. मोहम्मद सुल्तान खुरू के साथ। पीजीआई चंडीगढ़ में हृदय रोग विशेषज्ञ बनने के लिए निकलने वाले डॉ. खुरू ने कार्डियोलॉजी की बजाय गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में कदम रखा और हेपेटाइटिस-ई की खोज कर चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा दी। उनके नाम पर सैकड़ों शोध पत्र हैं, जो उनकी मेहनत और प्रतिभा का प्रमाण हैं। उत्तरी कश्मीर के सोपोर में जन्मे डॉ. खुरू ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और 1962 में जीएमसी श्रीनगर में एमबीबीएस में प्रवेश प्राप्त किया। 1970 में जनरल मेडिसिन में पीजी करने के बाद, वह जीएमसी श्रीनगर में लेक्चरर बने। इसके बाद, उन्होंने पीजीआई चंडीगढ़ में सुपर स्पेशलाइजेशन करने का निर्णय लिया, जहाँ के निदेशक डॉ. पीएस चुट्टानी ने उन्हें कार्डियोलॉजी के बजाय गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में डीएम करने का निर्देश दिया। यह निर्णय उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। 1976 से 1978 के बीच, उन्होंने अपने क्लिनिकल कौशल को निखारा और चिकित्सा के प्रति गहरी रुचि विकसित की। 1978 में डीएम (गैस्ट्रोएंटरोलॉजी) की डिग्री प्राप्त करने के बाद, वह जीएमसी श्रीनगर लौट आए। उसी समय, कश्मीर में पीलिया की भीषण महामारी फैल गई, जिसने हजारों लोगों को प्रभावित किया। डॉ. खुरू ने लगभग 500 स्वास्थ्यकर्मियों के साथ मिलकर प्रभावित क्षेत्रों में सेवा करने का निर्णय लिया। इस चुनौतीपूर्ण समय में, उन्होंने स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत किया और मरीजों का उपचार किया। इस दौरान, उनके कई सहयोगियों ने उनकी आलोचना की, लेकिन उन्होंने कहा कि वह उन सभी का धन्यवाद करते हैं जिन्होंने उनका साथ नहीं दिया, क्योंकि इसी कारण वह अकेले इस कार्य को कर सके। उन्होंने अपने निजी चिकित्सकीय अभ्यास से अर्जित आय का बड़ा हिस्सा सामाजिक सेवा और वैज्ञानिक अनुसंधान पर खर्च किया।
डॉ. खुरू ने महामारी के दौरान घर-घर जाकर अभूतपूर्व सर्वेक्षण किया और महामारी की शुरुआत के 18 महीने बाद और फिर 14 वर्ष बाद तक विस्तृत अध्ययन कर आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। इस शोध के परिणामस्वरूप हेपेटाइटिस-ई की खोज हुई, जिसने चिकित्सा विज्ञान में एक नया अध्याय जोड़ा। इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और चिकित्सा इतिहास में हेपेटाइटिस-ई के खोजकर्ता के रूप में स्थापित किया। 1982 से 1995 के बीच, शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में कार्यरत रहते हुए, डॉ. खुरू ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक और अभूतपूर्व शोध किए। उन्होंने देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित शोध संस्थानों के साथ मिलकर इस बीमारी पर व्यापक अध्ययन किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर की मेडिकल पत्रिकाओं में अनेक शोध प्रकाशित किए। अपने एक महत्वपूर्ण शोध में, उन्होंने साबित किया कि संक्रमित गर्भवती महिलाओं से हेपेटाइटिस-ई वायरस गर्भस्थ शिशु तक पहुंच सकता है, जिससे भ्रूण और नवजात में गंभीर बीमारी हो सकती है।









