Writing My Story: अपनी कहानी लिखना

मैं अक्सर लिखता हूँ, लिखता हूँ जग के फ़साने को, तुम्हारी दास्तान को। लेकिन खुद को लिखने में डरता हूँ, कहीं कोई पढ़ न ले। अगर कभी खुद के बारे में लिखूँगा, तो शुर
मैं अक्सर लिखता हूँ, लिखता हूँ जग के फ़साने को, तुम्हारी दास्तान को। लेकिन खुद को लिखने में डरता हूँ, कहीं कोई पढ़ न ले। अगर कभी खुद के बारे में लिखूँगा, तो शुरुआत होगी खाली जेब से, फटे बनियान से, बासी रोटी और प्याज से। यह सब मेरे जीवन की सच्चाई है, जिसमें जूट के बोरे में लिपटी स्लेट और कीचड़ से लथपथ नंगे पाँव शामिल हैं। आँखों में नींद नहीं है, लालटेन में तेल नहीं है, और जुगनू भी आज बीमार है। चाँद की रोशनी भी आज मद्धिम है। इन सबके बीच, लिखने की इच्छा फिर भी जीवित है। एक दिन मैं खुद को लिखूँगा और खुद से पूछूँगा, कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? या कहीं कुछ ज़्यादा ही लिख तो नहीं गया? मुझे पता है कि लोग मुझसे सवाल करेंगे, प्रेम नहीं लिखा? विरह नहीं लिखा? वफा नहीं लिखा? एक भी सच नहीं लिखा? पर मैं मौन रहूँगा, खुद को परत-दर-परत खुलने से बचाना चाहूँगा। क्योंकि मुझे पता है कि गरीब से प्रेम कौन करता है, बीते लम्हों पर विश्वास कौन करता है। यह सब मेरे अंदर की गहराई को दर्शाता है, जो शब्दों में नहीं ढलता। लिखना एक कला है, लेकिन खुद को लिखना एक चुनौती है। यह चुनौती उस समय और स्थान पर निर्भर करती है, जहाँ हम खड़े हैं। क्या हम अपने भीतर की सच्चाइयों को उजागर करने के लिए तैयार हैं? क्या हम अपने अनुभवों को शब्दों में ढालने का साहस रखते हैं? यह सवाल मेरे मन में हमेशा गूंजते रहते हैं। मैं जानता हूँ कि एक दिन मुझे इन सवालों का सामना करना होगा। खुद को लिखने का साहस जुटाना होगा। तब शायद मैं अपने जीवन की कहानी को एक नई दिशा दे सकूँगा। तब मैं अपने अनुभवों को साझा कर सकूँगा, और शायद कोई मुझसे पूछेगा कि मैंने खुद को क्यों नहीं लिखा? यह सवाल मेरे लिए महत्वपूर्ण होगा। मैं जानता हूँ कि हर किसी की कहानी में कुछ न कुछ खास होता है, और मेरी कहानी भी कुछ अलग नहीं है।











