Human-Wildlife Conflict in Uttarakhand: उत्तराखंड में गहराता मानव-वन्यजीव संघर्ष

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है, जो अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ने लगी है। राज्य के 71.05 प्रतिशत वन क्ष
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है, जो अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ने लगी है। राज्य के 71.05 प्रतिशत वन क्षेत्र और विषम भूगोल के चलते, वन्यजीवों के हमले की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। वन विभाग के एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2011 से 2025 के बीच गुलदार और बाघ जैसे वन्यजीवों ने 63,478 मवेशियों को अपना शिकार बनाया है। इसका मतलब है कि हर साल औसतन 4,534 पशुधन ग्रामीणों के हाथ से छिन रहे हैं। यह आंकड़ा चिंताजनक है, खासकर तब जब हम यह देखें कि 2021 के बाद से स्थिति और भी गंभीर हो गई है। इसके अलावा, फसल क्षति की औसत घटनाएं भी बढ़कर 1,356 हो गई हैं, जिससे पशुधन और फसल सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है।
राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं। पशुपालन, जो ग्रामीणों की आजीविका का एक प्रमुख साधन है, अब वन्यजीवों के हमलों का शिकार हो रहा है। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011-12 में वन्यजीवों से पशुधन हानि के 2,319 मामले सामने आए थे, जो अब प्रतिवर्ष बढ़ते जा रहे हैं। 2021 से यह स्थिति और भी विकट हो गई है, जहां प्रतिवर्ष 5,000 से 6,500 मवेशी वन्यजीवों के हमले में मारे जा रहे हैं। इस स्थिति का सीधा असर ग्रामीणों की आजीविका पर पड़ रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है।














