Resort encroachment in Panna Tiger Reserve: पन्ना टाइगर रिजर्व में वन भूमि पर रिसॉर्ट का अतिक्रमण, रेंजर की रिपोर्ट को दबाया गया

भोपाल से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पन्ना टाइगर रिजर्व के इको सेंसेटिव जोन में छतरपुर जिले के राजगढ़ गांव में स्थित एक रिसॉर्ट के अतिक्रमण का मामला सामने आया है
भोपाल से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पन्ना टाइगर रिजर्व के इको सेंसेटिव जोन में छतरपुर जिले के राजगढ़ गांव में स्थित एक रिसॉर्ट के अतिक्रमण का मामला सामने आया है। इस रिसॉर्ट का निर्माण लगभग पांच एकड़ वन भूमि पर किया गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति के पहले रेंजर ने इस मामले में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जो 27 जनवरी 2025 को उप संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व के नाम से सौंपी गई थी। मड़ला रेंजर द्वारा की गई जांच में यह अनुशंसा की गई थी कि जिन खसरों की भूमियों की जांच की गई है, उनकी रजिस्ट्री खारिज करने के लिए कलेक्टर छतरपुर को पत्र लिखा जाए। लेकिन इस संदर्भ में कोई भी पत्र नहीं लिखा गया, जिससे यह मामला और भी जटिल हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह जमीन वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी बी. श्रीनिवास कुमार और उनकी पत्नी हिमानी सरद द्वारा खरीदी गई थी। यहां आलीशान रिसॉर्ट का निर्माण किया गया है। 28 नवंबर 2024 को किए गए निरीक्षण में पाया गया कि खसरा नंबर 1841 की शासकीय वन भूमि पर रिसॉर्ट और भवन निर्माण कार्य जारी था। वन विभाग की टीम ने जीपीएस रीडिंग और सर्वे के माध्यम से लगभग 7.70 हेक्टेयर क्षेत्र का सीमांकन किया। निरीक्षण के दौरान वन कर्मचारियों ने निर्माण कार्य को रोकने का अनुरोध किया, लेकिन कथित रूप से कार्य जारी रहा।
इस मामले में दस्तावेजों में यह भी उल्लेख किया गया है कि संबंधित व्यक्ति द्वारा कुछ खसरा-खतौनी प्रस्तुत की गई, किंतु उनकी सत्यापित प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गईं। वन विभाग ने पंजीयन और राजस्व अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां मांगीं, जो पत्र जारी होने तक प्राप्त नहीं हुई थीं। राजस्व अधिकारियों की उपस्थिति में 24 जनवरी 2025 को संयुक्त सीमांकन कराया गया था। सीमांकन और पटवारी नक्शे के आधार पर यह पाया गया कि खसरा नंबर 1841/3/1 व 1841/1/1 का हिस्सा वन सीमा के भीतर आता है और रिसॉर्ट का निर्माण वन भूमि पर किया गया है। इस रिपोर्ट में उप संचालक से अनुरोध किया गया है कि संबंधित खसरों की रजिस्ट्री खारिज कराने के लिए कलेक्टर, छतरपुर को पत्र लिखा जाए, ताकि शिकायतों का विधिसम्मत निराकरण हो सके। यह रिपोर्ट पिछले साल जनवरी में ही दी गई थी, जबकि मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट अक्टूबर में आई थी। रेंजर की रिपोर्ट को न सिर्फ फील्ड डायरेक्टर ने, बल्कि भोपाल के वन अधिकारियों ने भी दबा दिया था।









