Revival of Samba Calico Art: सांबा की कैलिको कला को जीआई टैग से मिलेगी नई पहचान

जम्मू कश्मीर और लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत अब वैश्विक पहचान की ओर बढ़ रही है। सांबा की लुप्त होती कैलिको छपाई कला और किश्तवाड़ की पाडर घाटी का दुर्लभ नीला नीलम
जम्मू कश्मीर और लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत अब वैश्विक पहचान की ओर बढ़ रही है। सांबा की लुप्त होती कैलिको छपाई कला और किश्तवाड़ की पाडर घाटी का दुर्लभ नीला नीलम, दोनों उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग दिलाने की प्रक्रिया में शामिल किया गया है। जीआई टैग मिलने के बाद इनकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान सुरक्षित होगी, जिससे स्थानीय कारीगरों और किसानों को नए बाजारों में अवसर प्राप्त होंगे। सांबा का क्षेत्र कभी हाथ से छपी खूबसूरत चादरों के लिए प्रसिद्ध था, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'छींट' कहा जाता था। यह कला डोगरा क्षेत्र की कलात्मक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, जिसमें कारीगर प्राकृतिक रंगों से कपड़े पर विभिन्न डिजाइनों की छपाई करते हैं। हालांकि, मशीन निर्मित कपड़ों के बढ़ते चलन ने इस परंपरा को कमजोर कर दिया है। जीआई टैग मिलने की उम्मीद से अब इस कला के पुनर्जीवन की संभावना बढ़ी है। कारीगरों का मानना है कि इससे असली हस्तनिर्मित उत्पादों की पहचान मजबूत होगी और नई पीढ़ी भी इस विरासत से जुड़ सकेगी।
किश्तवाड़ की पाडर घाटी से निकलने वाला नीला नीलम अपनी दुर्लभ गुणवत्ता और चमक के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। जीआई टैग की प्रक्रिया में शामिल होने से पाडर नीलम को प्रमाणिक पहचान मिलने की उम्मीद है, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिष्ठा बढ़ेगी। जम्मू-कश्मीर के 26 और लद्दाख के 6 उत्पाद जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया में हैं, जिनमें कृषि उत्पाद, प्राकृतिक संसाधन, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजन शामिल हैं। प्रमुख उत्पादों में पाडर नीला नीलम, सांबा कैलिको प्रिंट, कश्मीर हाउसबोट, कश्मीरी अखरोट, और लद्दाख की खुबानी शामिल हैं। डल झील की पारंपरिक हाउसबोट कश्मीर की पहचान का प्रतीक रही हैं। लकड़ी की नक्काशी और विशेष निर्माण शैली वाली ये हाउसबोट पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। इसके अलावा, अन्य पारंपरिक शिल्पों को भी जीआई पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है।











