Nawab Majju Khan's bravery in 1857: नवाब मज्जू खां की 1857 की क्रांति में अद्वितीय शौर्य गाथा

1857 में जब पूरा भारत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो रहा था, तब मुरादाबाद में नवाब मज्जू खां ने क्रांति की कमान संभाली। उन्होंने नागर
1857 में जब पूरा भारत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो रहा था, तब मुरादाबाद में नवाब मज्जू खां ने क्रांति की कमान संभाली। उन्होंने नागरिकों को संगठित कर अंग्रेजी सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया। उनके इस पराक्रम के परिणामस्वरूप उन्हें मुगल साम्राज्य द्वारा मुरादाबाद का नाजिम नियुक्त किया गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने नवाब मज्जू खां के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिए उन पर भारी सैन्य बल से हमला किया और उन्हें बंदी बना लिया। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा दी गई अमानवीय यातनाओं के बावजूद, नवाब मज्जू खां ने अपने राष्ट्रप्रेम से समझौता नहीं किया। उनका यह बलिदान क्षेत्र के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
स्वाधीनता आंदोलन का असर जब मुरादाबाद पहुंचा, तो नवाब मज्जू खां ने स्थानीय सेनानियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। उनके रणनीतिक कौशल के कारण अंग्रेज अधिकारियों को अस्थायी रूप से भागना पड़ा। यह सफलता क्षेत्रवासियों में स्वदेशी शासन की उम्मीद जगाने वाली थी।
1858 में अंग्रेजी सेना ने मुरादाबाद पर दोबारा नियंत्रण करने की कोशिश की। नवाब मज्जू खां ने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ अंत तक मुकाबला किया। बंदी बनाए जाने के बाद उन पर गंभीर मुकदमे दर्ज किए गए और मौत की सजा सुनाई गई।
अंग्रेजों ने नवाब मज्जू खां पर खौलता चूना डालने जैसी बर्बर यातनाएं दीं, जिसके बाद वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनके त्याग ने मुरादाबाद के गलशहीद स्थल को ऐतिहासिक पहचान दी, जो आज भी प्रेरणा देता है।















