Supreme Court Ruling: जीवन के अंत तक जेल में रखे जाने की सजा संवैधानिक नहीं है

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में उम्र कैद की सजा को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दोषियों को उनके प्राकृतिक जीवन के
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में उम्र कैद की सजा को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दोषियों को उनके प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रखने की सजा संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करती है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि उम्र कैद की सजा काट रहे दोषियों को जीवन के अंत तक कैद में रखने का निर्णय पूरी तरह से वैध है। अदालत ने इस निर्णय में पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया, जिसमें पहले ही यह स्पष्ट किया गया था कि उम्र कैद की सजा काट रहे दोषियों को उनके जीवन के अंत तक जेल में रखने का प्रावधान संवैधानिक है। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने उन दलीलों को खारिज कर दिया, जो इस सजा को असंवैधानिक बताने का प्रयास कर रही थीं।
अदालत ने यह भी कहा कि जघन्य अपराधों के मामलों में, जहां फांसी की सजा नहीं दी जा रही है, वहां अदालतें दोषियों को उनके जीवन के अंत तक जेल में रखने का आदेश दे सकती हैं। इसके अलावा, समय से पहले सजा माफी या रिहाई के संबंध में भी अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अदालत ने 'बिना किसी रियायत' के ताउम्र जेल की सजा दी है, तो दोषी समय से पहले रिहाई का दावा नहीं कर सकता। वहीं, यदि अदालत ने 'बिना छूट' का उल्लेख नहीं किया है, तो राज्य सरकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत सजा कम करने का अधिकार रखती है। इस प्रकार, अदालत ने सजा के प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए यह सुनिश्चित किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।















