Impact of US Grain Imports: कौन बचेगा किसान या भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता?

आज की वैश्विक भू-राजनीति में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि आर्थिक प्रतिबंध और आपूर्ति शृंखलाओं की नाकेबंदी से भी। ऐसे में, किसी राष्ट्र की असली ताक
आज की वैश्विक भू-राजनीति में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि आर्थिक प्रतिबंध और आपूर्ति शृंखलाओं की नाकेबंदी से भी। ऐसे में, किसी राष्ट्र की असली ताकत इस बात से तय होती है कि वह संकट के समय अपने नागरिकों का पेट भरने में कितना आत्मनिर्भर है। हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक कृषि व्यापार समझौते की चर्चा तेज हुई है, जिसके साथ ही किसानों का विरोध भी मुखर हो गया है। मुक्त व्यापार के समर्थक इसे आर्थिक उदारीकरण का अगला चरण मानते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत और वैश्विक सामरिक उदाहरणों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि कृषि को महज एक व्यापारिक वस्तु मानना भारत के लिए आत्मघाती हो सकता है।
फरवरी 2026 के भारत-अमेरिका समझौते ने भारत को अमेरिकी बाजार में तरजीही पहुंच दिलाई, लेकिन इसमें संवेदनशील कृषि क्षेत्र और डेयरी को बाहर रखा गया था। इसी तरह, जुलाई 2026 के भारत-ब्रिटेन सीईटीए के तहत ब्रिटेन ने अधिकांश भारतीय उत्पादों से शुल्क हटा लिया, लेकिन भारतीय कृषि और डेयरी क्षेत्र को इससे बाहर रखा गया। न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौते में भी भारत ने अपने डेयरी उद्योग को संरक्षित रखा। हालांकि, भारत-अमेरिका कृषि व्यापार समझौते पर चिंता इसलिए है क्योंकि अमेरिका भारतीय बाजार को अपने जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों, मक्का, सोयाबीन और डेयरी उत्पादों के लिए खोलने का दबाव बना रहा है।
















