Tiger captivity in Pilibhit: इंसानी गलतियों की सजा काट रहे जंगल के राजा

पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) अपनी हरी-भरी वादियों और बाघों की बढ़ती संख्या के कारण आज ईको-टूरिज्म का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। इस टाइगर रिजर्व ने अंतरराष्ट्
पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) अपनी हरी-भरी वादियों और बाघों की बढ़ती संख्या के कारण आज ईको-टूरिज्म का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। इस टाइगर रिजर्व ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टीएक्सटू और कैट्स जैसे पुरस्कार भी जीते हैं, जिससे इसकी पहचान वैश्विक पटल पर बनी है। लेकिन इस सफलता के साथ ही एक गंभीर समस्या भी उभरी है, जो मानव-वन्यजीव संघर्ष के रूप में सामने आई है। इस संघर्ष में अब तक लगभग 60 से अधिक इंसानों की जान जा चुकी है, और इसके परिणामस्वरूप कई बाघों को बाड़ों में उम्रकैद की सजा भुगतनी पड़ रही है। यह स्थिति न केवल बाघों के लिए दुखद है, बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।
पीटीआर के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2014 में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद से अब तक 27 रेस्क्यू ऑपरेशन किए जा चुके हैं। इन अभियानों में कुल 24 बाघ-बाघिनों को ट्रेंकुलाइज कर पकड़ा गया है, जिनमें पांच शावक भी शामिल हैं। इनमें से 12 बाघों को स्वास्थ्य परीक्षण के बाद उनके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ दिया गया, जबकि अन्य 12 बाघ-बाघिनों को जंगल लौटने के लिए अयोग्य करार दिया गया। इन बाघों को चिड़ियाघरों में भेजा गया है, जहां वे अब अपनी जिंदगी के बाकी दिन लोहे के जाल और ऊंची चहारदीवारी के पीछे बिताने को मजबूर हैं।
इन बाघों में से कुछ बेहद चर्चित नाम भी शामिल हैं, जैसे कि बाघ केसरी, जिसे गोरखपुर चिड़ियाघर भेजा गया था और बीमारी के चलते उसकी मौत हो गई। वहीं, आदमखोर बाघिन मिठ्ठी, जिसे कानपुर प्राणी उद्यान में भेजा गया था, अब दर्शकों के लिए मुख्य आकर्षण बनी हुई है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के सिकुड़ने और बाघों के प्राकृतिक आवास में बढ़ते मानव दखल के कारण यह संघर्ष बढ़ रहा है। जब तक वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कारिडोर और उनके पर्यावास का दायरा नहीं बढ़ेगा, तब तक इस समस्या पर नियंत्रण पाना मुश्किल होगा।









