World Tiger Day: शाहजहांपुर में कभी सुनाई पड़ती थी बाघों की दहाड़, अंग्रेजों ने सूना कर दिया था जंगल

शाहजहांपुर के उत्तर और उत्तर-पूर्व के घने जंगलों में एक समय बाघों की दहाड़ गूंजती थी। यह क्षेत्र बाघों के स्वतंत्र विचरण और प्रजनन के लिए देश के सबसे उपयुक्त स्
शाहजहांपुर के उत्तर और उत्तर-पूर्व के घने जंगलों में एक समय बाघों की दहाड़ गूंजती थी। यह क्षेत्र बाघों के स्वतंत्र विचरण और प्रजनन के लिए देश के सबसे उपयुक्त स्थानों में से एक माना जाता था। एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष और इतिहासकार डॉ. विकास खुराना के अनुसार, ब्रिटिशकालीन दस्तावेजों में उल्लेख है कि 19वीं सदी की शुरुआत तक बाघ रामगंगा तक निर्बाध रूप से विचरण करते थे। इस क्षेत्र की जलवायु और घने वन बाघों के लिए अनुकूल थे। लेकिन अंग्रेज अधिकारियों के शिकार के जुनून ने बाघों की संख्या को कुछ ही दशकों में कम कर दिया। गजेटियर ऑफ टेरिटरीज अंडर द नॉर्थ वेस्ट प्रोविन्स, द लेविन लेटर्स और द ओरिजिनल स्पोर्ट्स में तत्कालीन जिलाधिकारी मॉड्यूटेंट रिक्ट्रेट के 20 बाघों के शिकार का उल्लेख है, जबकि कर्नल प्लेट और वॉर्मटेंट पार्टी के 12-12 बाघों का शिकार किया गया। इस प्रकार, वर्ष 1909 तक जिले से बाघ लगभग समाप्त हो चुके थे।
डॉ. खुराना ने बताया कि बाघों के खत्म होने के बाद शाहजहांपुर में भेड़ियों का आतंक बढ़ गया, और इसे भेड़ियों का घर तक कहा जाने लगा। भेड़ियों की बढ़ती संख्या ने स्थानीय लोगों के लिए समस्याएँ उत्पन्न कीं। हालांकि, वन्यजीव संरक्षणवादी बिली अर्जन सिंह के प्रयासों से 1977 में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना हुई, और 1988 में पीलीभीत टाइगर रिजर्व अस्तित्व में आया, जिसमें शाहजहांपुर की 1736.90 हेक्टेयर भूमि भी शामिल की गई। इन प्रयासों के फलस्वरूप बाघों के पुनर्वास में मदद मिली, जिसमें प्रिंस, हैरियट, जूलियट और बाघिन तारा जैसे बाघ शामिल थे। इन बाघों के पुनर्वास ने संरक्षण अभियान को एक नई दिशा दी।











