1857 Freedom Struggle: मुस्कुराते हुए चूम लिया था फांसी का फंदा मौलवी किफ़ायत अली का बलिदान

मौलवी किफ़ायत अली काफ़ी, भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) के अमर सेनानायक, मुरादाबाद में क्रांति की ज्वाला भड़काने वाले महान विद्वान थे। जून 1857 में उन्
मौलवी किफ़ायत अली काफ़ी, भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) के अमर सेनानायक, मुरादाबाद में क्रांति की ज्वाला भड़काने वाले महान विद्वान थे। जून 1857 में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहला इंकलाबी फ़तवा जारी किया, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता को अभूतपूर्व शक्ति दी। इस फ़तवे ने देशभक्तों को गीता और कुरान को साक्षी मानकर मातृभूमि की रक्षा की शपथ लेने के लिए प्रेरित किया।
क्रांति के दौरान मौलवी काफ़ी साहब को शहर का सद्र-उश-शरिया (मुख्य न्यायाधीश) नियुक्त किया गया था। उनकी ओजस्वी तकरीरों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला कर रख दिया। लेकिन, रामपुर के नवाब यूसुफ़ अली ख़ां की अंग्रेजों से सांठगांठ और स्थानीय मुखबिरों की गद्दारी के कारण अप्रैल 1858 में रामगंगा तट पर हुए युद्ध में नवाब मज्जू ख़ां की सेना पराजित हो गई। इसके बाद अंग्रेजी सेना ने मुरादाबाद पर पुनः कब्जा कर लिया।
मौलवी काफ़ी साहब को गिरफ्तार कर उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और मई 1858 में मुरादाबाद जेल के बाहर उन्हें फांसी दे दी गई। उनका यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति और अखंडता का प्रतीक बन गया। उन्होंने अंतिम समय में भी मुस्कुराते हुए शहादत का जाम पी लिया।
1857 की क्रांति के समय मौलवी किफ़ायत अली काफ़ी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जंग का फ़तवा जारी किया। इस फ़तवे के बाद मुरादाबाद के हिंदू और मुसलमानों ने एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजा दिया। मौलवी साहब ने अपनी बागी तकरीरों से शहरवासियों के भीतर आजादी की लौ प्रज्वलित कर दी थी।
















