Child Care Leave Ruling: संविदा महिला कर्मचारी को चाइल्ड केयर लीव से वंचित करना पड़ा महंगा, राज्य शिक्षा केंद्र संचालक पर 50000 रुपये जुर्माना; MP हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। बाल देखभाल अवकाश (चाइल्ड केयर लीव-ccl) के मामले में सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी करना राज्य शिक्षा
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। बाल देखभाल अवकाश (चाइल्ड केयर लीव-CCL) के मामले में सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी करना राज्य शिक्षा केंद्र के संचालक हरजिंदर सिंह के लिए महंगा साबित हुआ है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने संविदा महिला कर्मचारी आयशा शेख की छुट्टी का आवेदन निरस्त करने वाले विभागीय आदेश को रद्द करते हुए संचालक पर 50 हजार रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया है। न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने यह आदेश बुरहानपुर निवासी आयशा शेख की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी ने अदालत में बताया कि आयशा शेख को अपने अधिकार के लिए नौवीं बार कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जो विभागीय मनमानी को दर्शाता है। राज्य शिक्षा केंद्र ने 16 जुलाई को उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सामान्य प्रशासन विभाग के 22 जुलाई 2023 के परिपत्र के अनुसार संविदा कर्मचारियों को चाइल्ड केयर लीव का लाभ नहीं दिया जा सकता। इस पर हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1977 के नियम 38-सी के तहत महिला सरकारी कर्मचारियों को 730 दिन तक चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान है। वहीं, पूर्व के न्यायिक निर्णयों के अनुसार संविदा महिला कर्मचारियों को भी दो बच्चों की देखभाल के लिए 240 दिन तक सीसीएल का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि कानून की अंतिम व्याख्या न्यायालय करता है और कोई भी विभागीय परिपत्र न्यायिक आदेशों से ऊपर नहीं हो सकता। हाई कोर्ट ने राज्य शिक्षा केंद्र को याचिकाकर्ता को तत्काल बाल देखभाल अवकाश स्वीकृत करने का निर्देश दिया। साथ ही संचालक हरजिंदर सिंह को 30 दिनों के भीतर 50 हजार रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना जमा करने का आदेश भी दिया। यह फैसला संविदा महिला कर्मचारियों के अवकाश संबंधी अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक अहम न्यायिक मिसाल भी बनेगा। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि संविदा महिला कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय हमेशा तत्पर रहेगा। यह मामला न केवल आयशा शेख के लिए बल्कि अन्य संविदा महिला कर्मचारियों के लिए भी एक प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। कोर्ट के इस आदेश से यह संदेश भी गया है कि किसी भी विभागीय आदेश को न्यायिक आदेशों के खिलाफ नहीं रखा जा सकता, और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी कर्मचारियों को उनके अधिकारों का पूरा लाभ मिले।
















