Supreme Court Ruling: कंपनी को पक्षकार बनाए बिना नहीं चलेगा चेक बाउंस का मामला

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मामले में मुख्य आरोपी के रूप में कंपनी
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मामले में मुख्य आरोपी के रूप में कंपनी को पक्षकार नहीं बनाया गया है, तो केवल उसके निदेशक या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के खिलाफ शिकायत कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकती। यह निर्णय जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने एक महिला द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के अनुसार कंपनी एक 'न्यायिक व्यक्ति' होती है और चेक उसी के खाते से जारी किया जाता है। इस मामले में, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया गया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को कंपनी को आरोपित के रूप में जोड़ने का निर्देश दिया गया था।
सुनवाई के दौरान, आरोपित महिला की ओर से अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे ने दलील दी कि जब कोई कंपनी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (एनआइ) एक्ट की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध करती है, तो बिना कंपनी को मुख्य आरोपित बनाए उसके किसी निदेशक के खिलाफ शिकायत चलाना पूरी तरह से अवैध है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने इस कानूनी पहलू को नजरअंदाज करते हुए गंभीर भूल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट या ट्रायल कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर कंपनी को दूसरा आरोपित बनाने का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया था।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि मूल शिकायत में कंपनी को आरोपित के रूप में शामिल न करने की एक घातक त्रुटि थी, इसलिए इसके आधार पर आगे की पूरी कानूनी कार्यवाही स्वतः अमान्य हो जाती है। यह विवाद एक लेनदेन से जुड़ा हुआ था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि कंपनी पर उसकी सेवाओं के बदले पांच लाख रुपये बकाया थे। इस बकाये के भुगतान के एवज में कंपनी की एक निदेशक ने पांच लाख रुपये का चेक जारी किया था, जो बैंक से 'पेमेंट स्टॉप बाय ड्रावर' के निर्देश के साथ बाउंस होकर वापस लौट आया। इसके बाद, शिकायतकर्ता ने आरोपित महिला को मांग का नोटिस भेजा, लेकिन भुगतान न होने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई। ट्रायल कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था। जब मामला बयान दर्ज करने के चरण में पहुंचा, तो महिला ने हाईकोर्ट का रुख कर कार्यवाही को रद करने की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने राहत देने के बजाय ट्रायल कोर्ट को कंपनी को जोड़ने का आदेश दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
















