Changing Perspectives on Daughters: परिवार का आधार, पराया धन नहीं

राजस्थान के नागौर जिले के सुरियास गांव में हाल ही में एक बेटी का पाग दस्तूर किया गया। पारंपरिक व्यवस्था में, पिता के निधन के बाद परिवार के बड़े बेटे को उत्तराधि
राजस्थान के नागौर जिले के सुरियास गांव में हाल ही में एक बेटी का पाग दस्तूर किया गया। पारंपरिक व्यवस्था में, पिता के निधन के बाद परिवार के बड़े बेटे को उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है। लेकिन कान सिंह राठौड़ के निधन के बाद उनकी पत्नी और माता ने निर्णय लिया कि उनकी दस वर्षीय बेटी का पाग दस्तूर किया जाएगा। यह निर्णय पुरानी परंपरा को चुनौती देते हुए एक नया संदेश देता है कि परिवार की पहचान और सम्मान केवल बेटे से नहीं, बल्कि बेटी से भी बढ़ सकता है।
गांव के लोगों का मानना है कि इस निर्णय ने सामाजिक सोच में बदलाव लाने का कार्य किया है। बेटियों को पहले पराया धन माना जाता था, लेकिन अब उनकी भूमिका को समझा जा रहा है। एक विश्लेषण के अनुसार, 1980 से अब तक लगभग पांच करोड़ बेटियां जन्म से पहले समाप्त कर दी गईं, लेकिन हाल के वर्षों में यह आंकड़ा घट रहा है। 2001 से अब तक 70 लाख बेटियों को बचाया गया है।
भारत में बेटियों की स्थिति में सुधार के लिए कई सरकारी योजनाएं कार्यरत हैं, जैसे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'। ये योजनाएं कन्या भ्रूण हत्या रोकने और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने में मदद कर रही हैं। अब माता-पिता बेटियों को भी उसी प्यार और संसाधनों के साथ पालने लगे हैं जो पहले केवल बेटों के लिए समझा जाता था।
हालांकि, अभी भी कुछ दूरदराज क्षेत्रों में भेदभाव और कुरीतियों के अंश बचे हैं। लेकिन यह बदलाव सकारात्मक दिशा में है, और उम्मीद है कि आने वाले समय में बेटियों को लेकर सोच और भी बदल जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सांसदों को पुस्तकालय में समय बिताने की सलाह दी है, जो संसदीय मूल्यों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।



















