Education Crisis: 100 में से केवल 47 बच्चे 12वीं तक पहुंचते हैं

जुलाई का महीना आते ही देशभर के स्कूलों में नए सत्र की शुरुआत होती है। बच्चों का स्कूल में दाखिला लेना हर माता-पिता का सपना होता है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय के आंक
जुलाई का महीना आते ही देशभर के स्कूलों में नए सत्र की शुरुआत होती है। बच्चों का स्कूल में दाखिला लेना हर माता-पिता का सपना होता है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। UDISE+ 2024-25 के अनुसार, देश में लाखों परिवारों के बच्चों को 14-15 साल की उम्र में शिक्षा या कमाई में से एक चुनने की कठिनाई का सामना करना पड़ता है। लड़के मजदूरी, खेत या दुकान पर काम करने लगते हैं, जबकि लड़कियां घर के काम और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी संभालती हैं। 10वीं के बाद पढ़ाई का खर्च कई परिवारों के लिए मुश्किल हो जाता है, जिसके कारण माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट की दर में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।
UDISE+, NFHS और अन्य सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे कई सामाजिक कारण हैं। इनमें टॉयलेट्स की कमी, मासिक धर्म के दौरान सुविधाओं का अभाव, सुरक्षा की चिंता और कम उम्र में शादी शामिल हैं। ये सभी कारण लड़कियों के लिए माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की स्थिति को बढ़ाते हैं। इसके अलावा, ASER (Annual Status of Education Report) का कहना है कि एक बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के स्तर की किताबें ठीक से नहीं पढ़ पाते और बुनियादी गणित में कठिनाई महसूस करते हैं। जब ये बच्चे 9वीं और 10वीं की कठिन पढ़ाई तक पहुंचते हैं, तो कई पढ़ाई छोड़ देते हैं।


















