Warning for BJP to Act in Time: भाजपा के लिए समय रहते संभलने की चेतावनी

राजकुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक, ने भाजपा को हाल ही में हुए उप चुनावों के परिणामों को लेकर चेतावनी दी है। बांकीपुर और दतिया में भाजपा को मिल
राजकुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक, ने भाजपा को हाल ही में हुए उप चुनावों के परिणामों को लेकर चेतावनी दी है। बांकीपुर और दतिया में भाजपा को मिले झटके ने पार्टी के आत्मविश्वास को चुनौती दी है। उप चुनावों में मिले अप्रत्याशित परिणाम भाजपा के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। पुष्कर सिंह धामी, जो मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हार गए थे, को पुनः उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया था। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। गोरखपुर लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार पहले प्रयास में हार गई थी। रवनीत सिंह बिट्टू को लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी मंत्री बना दिया गया था। राजस्थान में सुरेंद्र पाल सिंह को मंत्री बना दिया गया, जबकि वे विधानसभा चुनाव हार चुके थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत सीट पर नए राजनीतिक खिलाड़ी से हार जाना एक बड़ा झटका है। यह हार बिहार में हुई है, जहां भाजपा ने पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का जश्न मनाया था। नामांकन के बाद उम्मीदवारों में बदलाव ने भी भाजपा की असहजता को दर्शाया है, विशेषकर जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर के उप चुनाव में उतरने से। मुख्य विपक्षी दल राजद का तीसरे स्थान पर खिसक जाना बिहार की राजनीति में एक नई करवट का संकेत है। दतिया में हार को भी कम नहीं आंका जा सकता। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी, और यह नरोत्तम मिश्रा की सीट है। भाजपा के लिए उप चुनावों में आशुतोष तिवारी को टिकट देने के विरोध में समर्थकों ने बवाल किया, जिससे यह चुनाव भाजपा और मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी ने भी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई। भाजपा के लिए गुजरात की मांजलपुर सीट ही सांत्वना पुरस्कार की तरह रही, लेकिन वहां भी जीत का अंतर घट गया। भाजपा का राजनीतिक चरित्र सांत्वना पुरस्कार से संतुष्ट नहीं होने वाला है, लेकिन यह सच है कि सप्ताह भर में भाजपा को दूसरा बड़ा झटका लगा। एनडीए सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होने के संबंध में राजनाथ सिंह के पुराने बयान को नजरअंदाज कर दें, तो भी नरेंद्र मोदी सरकार की छवि ऐसी बन गई है कि उनसे झुकने की उम्मीद बेमानी रही। हालांकि, पीछे हटना पड़ता रहा है। किसान आंदोलन के चलते तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था। इसी साल अप्रैल में मोदी सरकार का परिसीमन विधेयक 54 वोटों के अंतर से संसद में गिर गया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की तरह 12 साल में विधेयक गिरने का यह पहला मौका था। नीट-यूजी पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन ने जो दबाव बनाया, वह विपक्ष मिलकर भी 12 साल में नहीं बना पाया। यह विपक्ष के लिए बिना टिकट खरीदे ही लॉटरी खुल जाने जैसा है। पश्चिम बंगाल में अप्रत्याशित जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना को तोड़कर राजग ने विपक्ष का मनोबल ध्वस्त कर दिया था। माना जा रहा था कि परिसीमन समेत कुछ संविधान संशोधन विधेयक पारित करवाने के लिए मोदी सरकार ने दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ कर लिया है, लेकिन मानसून सत्र के पहले दिन सीजेपी के संसद मार्च में हुई हिंसा और पुलिस बल प्रयोग ने उन्हें रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट कर जेन-जी से संवाद के जरिए डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की, लेकिन उनकी पार्टी में वैसी कवायद नजर नहीं आई। चुनाव परिणाम समय का संकेत दे सकते हैं, लेकिन भाजपा को अपने भीतर आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है।
















