Hockey World Cup: 28 साल का सिलसिला टूटा, भारत का अंपायरिंग पैनल में कोई प्रतिनिधित्व नहीं

15 अगस्त से नीदरलैंड्स और बेल्जियम में आयोजित होने जा रहे fih पुरुष हॉकी वर्ल्ड कप से एक निराशाजनक खबर सामने आई है। 28 साल के लंबे इंतजार के बाद यह पहला मौका हो
15 अगस्त से नीदरलैंड्स और बेल्जियम में आयोजित होने जा रहे FIH पुरुष हॉकी वर्ल्ड कप से एक निराशाजनक खबर सामने आई है। 28 साल के लंबे इंतजार के बाद यह पहला मौका होगा जब वर्ल्ड कप में कोई भी भारतीय अंपायर या टेक्निकल ऑफिशियल मैच का संचालन करते हुए नजर नहीं आएगा। साल 1998 में यूट्रेक्ट में खेले गए वर्ल्ड कप के बाद यह पहला मौका है जब आधिकारिक पैनल में एक भी भारतीय चेहरा शामिल नहीं है। इस पैनल में यूरोपीय देशों के अंपायर्स का दबदबा है।
भारतीय हॉकी के आधुनिक युग में केवल चार पुरुष अंपायर ही वर्ल्ड कप तक का सफर तय कर पाए हैं। इनमें अमरजीत सिंह बावा, तरलोक सिंह भुल्लर, सतविंदर शर्मा और आर वी रघु प्रसाद शामिल हैं। आर वी रघु प्रसाद 2010, 2014, 2018 और 2023 में यह जिम्मेदारी निभा चुके हैं। पिछले साल इंटरनेशनल लेवल से संन्यास लेने वाले आर वी रघु प्रसाद पहले एशियाई अंपायर भी हैं जिन्होंने 200 इंटरनेशनल मैचों में अंपायरिंग की। इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन (FIH) की अंपायरिंग समिति केवल उन अधिकारियों का चयन करती है जिन्होंने ओलंपिक, प्रो लीग और पिछले वर्ल्ड कप में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है।
वर्ल्ड कप में अंपायरिंग कर चुके इन चारों अंपायर्स ने आगामी वर्ल्ड कप में भारतीय अंपायरों की अनुपस्थिति पर चिंता जताई है। दिग्गज अंपायर सतविंदर शर्मा ने इसे निराशाजनक बताते हुए कहा कि 2008 बीजिंग ओलंपिक में जब भारतीय पुरुष टीम क्वालिफाई नहीं कर पाई थी, तब भी वह एकमात्र अधिकारी के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने कहा कि घरेलू अंपायरों को जब तक इंटरनेशनल स्तर पर अंपायरिंग का मौका नहीं मिलेगा, तब तक वे मॉडर्न हॉकी की मांगों को नहीं समझ पाएंगे।
अंपायरिंग में युवाओं के न आने की सबसे बड़ी वजह फाइनेंशियल इनसिक्योरिटी और इंसेंटिव की कमी है। अमरजीत सिंह बावा ने बताया कि उनके समय में घरेलू मैचों में अंपायरों को 20 से 100 रुपये भत्ता मिलता था, लेकिन उन्हें कोई सम्मान या मेडल नहीं दिया जाता था। सतविंदर शर्मा ने बताया कि आज भी अधिकांश भारतीय अंपायर बेरोजगार हैं या केवल घरेलू मैचों तक सीमित हैं। आर वी रघु प्रसाद ने कहा कि खिलाड़ियों को मेडल जीतने पर सरकारी नौकरियां और सम्मान मिलते हैं, लेकिन अंपायरों को कोई वेतन या इंसेंटिव नहीं मिलता।















