DNA Test Order Invalid for Paternity: गुजरात HC का बड़ा फैसला 31 साल पुराने मामले में

गुजरात उच्च न्यायालय ने पितृत्व साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि यह कोई सामान्य प्रक्रिया
गुजरात उच्च न्यायालय ने पितृत्व साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है और केवल संदेह के आधार पर ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता। इस मामले में, वडोदरा पारिवारिक न्यायालय के समक्ष वर्ष 1994 में एक महिला ने अपनी 15 माह की पुत्री के भरण पोषण के लिए याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान, महिला ने वर्ष 2010 में अपने पति के पितृत्व को साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट की मांग की थी। पारिवारिक न्यायालय ने वर्ष 2012 में इस मांग को स्वीकार करते हुए डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया था। लेकिन इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे सी दोशी ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश का अवलोकन करते हुए कहा कि जब संतान बालिग हो और विवाहित हो, तो उसकी सहमति के बिना ऐसा आदेश उसकी निजता का उल्लंघन कर सकता है। यह निर्णय इस मामले की संवेदनशीलता को दर्शाता है, जहां एक महिला ने 31 वर्ष पहले अपने बच्चे के भरण पोषण के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। अब वह लड़की 32 साल की हो चुकी है और विवाहित है। न्यायालय ने यह भी कहा कि भरण पोषण का मामला समय पर निपटाया जाना चाहिए था, ताकि किसी भी प्रकार की मानसिक तनाव से बचा जा सके। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि यह प्रक्रिया किसी व्यक्ति की निजता को प्रभावित कर सकती है। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पितृत्व साबित करने के लिए न्यायालय को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए और केवल ठोस सबूतों के आधार पर ही ऐसे आदेश देने चाहिए। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाज में पितृत्व और पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं को भी उजागर करता है।















