Gen Z Movement Shifts Political Agendas: जंतर-मंतर के एक आंदोलन से बदलने लगे सरकार और पार्टियों के एजेंडे

जेन-जी (gen-g) ने राजनीतिक दलों को अब मतदाता सूची में हिंदू, मुसलमान, ओबीसी, दलित, सामान्य वर्ग और महिलाओं की गिनती करने की बजाय जेन-जी (gen-g) की काउंटिंग करने
जेन-जी (GEN-G) ने राजनीतिक दलों को अब मतदाता सूची में हिंदू, मुसलमान, ओबीसी, दलित, सामान्य वर्ग और महिलाओं की गिनती करने की बजाय जेन-जी (GEN-G) की काउंटिंग करने पर मजबूर कर दिया है। यह बदलाव भविष्य में जेन-जी को निर्णायक बना सकता है। चाहे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हो या विपक्षी दल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां, सभी का ध्यान अब सिर्फ जेन-जी वोटरों पर केंद्रित हो गया है।
जंतर-मंतर पर हुए जेन-जी आंदोलन ने सभी पूर्व गणनाओं को ध्वस्त कर दिया है। सत्तारूढ़ पार्टी और कांग्रेस दोनों ही 2027 और 2028 में होने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा आम चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। अब राजनीति का फोकस हिंदू-मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित, ओबीसी एवं महिला वोटरों को लुभाने से हटकर जेन-जी और जेन-अल्फा किशोरों को मनाने पर केंद्रित हो गया है।
केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार को पहली बार जेन-जी (GEN-G) आंदोलन ने ऐसा झटका दिया है, जिससे सरकार अब तक उबर नहीं पाई है। यह आंदोलन न केवल सत्तारूढ़ पार्टी की नींद उड़ाने वाला रहा, बल्कि अन्य पार्टियां भी इस आंदोलन के बाद सचेत हो गई हैं। युवाओं और किशोरों की अनदेखी नहीं की जा सकती, क्योंकि यही भविष्य के मतदाता हैं। पहले भी जेन-जी पीढ़ी के युवा ऐसे आंदोलनों में भाग लेते रहे हैं। जेपी आंदोलन में भी युवाओं ने इंदिरा गांधी की सरकार को हिला दिया था।
हालांकि, नरेंद्र मोदी सरकार को काफी लंबे अरसे बाद इस तरह के आंदोलन का सामना करना पड़ा है। जेन-जी के बाद की जेन-अल्फा पीढ़ी खुलकर अपनी बात कहने में संकोच नहीं करती। 1977 के चुनाव के वक्त सबसे अधिक शोर और सरकार के खिलाफ नारेबाजी किशोरों ने ही की थी। इसी तरह 1968 के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में भी किशोरों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हाल ही में हुए विधानसभा उप चुनावों में सत्तारूढ़ बीजेपी को मिली हार ने पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है।
















