Police Action on Students: छात्रों पर पुलिस एक्शन कितना जायज?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। यह सवाल उठता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। यह सवाल उठता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस को कितनी ताकत का इस्तेमाल करने का अधिकार है? कानून के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने या लाठीचार्ज का आदेश देने का अधिकार किसके पास होता है? इस संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि कानून और न्यायालय पुलिस को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग की कितनी छूट देते हैं और किन परिस्थितियों में ऐसा किया जा सकता है। भारतीय कानून के तहत, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का प्रयोग केवल विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, जिसमें न्यायिक फैसलों में तय सिद्धांतों और पुलिस नियमों का ध्यान रखना शामिल है। कानून और न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया है कि बल प्रयोग अंतिम उपाय होना चाहिए और इसे केवल उतना ही किया जाना चाहिए, जितना सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करने के लिए आवश्यक हो।
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 129 के तहत, कार्यकारी मजिस्ट्रेट, थाने का प्रभारी अधिकारी या उपनिरीक्षक से ऊपर का कोई पुलिस अधिकारी गैरकानूनी सभा को तितर-बितर करने का आदेश दे सकता है। यह प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 148 में समाहित है। यदि पांच या उससे अधिक लोगों की सभा सार्वजनिक शांति भंग करने की आशंका पैदा करती है और सभा के सदस्य तितर-बितर होने के आदेश का पालन नहीं करते, तो संबंधित अधिकारी उन्हें हटाने के लिए नागरिक बल का इस्तेमाल कर सकते हैं। गंभीर स्थिति में, जब नागरिक बल पर्याप्त न हो, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की मदद मांग सकता है। असाधारण परिस्थितियों में, जब सार्वजनिक सुरक्षा स्पष्ट रूप से खतरे में हो, तो सशस्त्र बलों का कोई कमीशंड या राजपत्रित अधिकारी अपने नियंत्रण वाले बलों को तैनात कर सकता है।
















