Political Tensions in Karnataka: शिवकुमार पर बीएल संतोष का तंज, कहा-वफादारी के नंबर बटोर रहे

कर्नाटक के नवनियुक्त मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के दिल्ली दौरे पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष ने तीखा हमला किया है। कर्नाटक की राजनीति का अखाड़ा एक बार
कर्नाटक के नवनियुक्त मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के दिल्ली दौरे पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष ने तीखा हमला किया है। कर्नाटक की राजनीति का अखाड़ा एक बार फिर दिल्ली में शिफ्ट हो चुका है। दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर संतोष ने शिवकुमार के दिल्ली दौरे को 'अच्छा टाइमपास' बताया है। यह केवल एक नेता के संसद दौरे का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कर्नाटक कांग्रेस की आंतरिक खींचतान और भाजपा की पैनी नजरों की कहानी भी शामिल है। बुधवार को, मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने नई दिल्ली में संसद भवन का दौरा किया, जहां वे लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का भाषण सुनने पहुंचे थे। इसके बाद उन्होंने X पर एक पोस्ट शेयर की, जिसमें उन्होंने लिखा, 'राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे जी के कक्ष से आज लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी के शक्तिशाली भाषण को देखना गर्व का पल था। उनके शब्दों ने भारत के युवाओं की आकांक्षाओं को प्रतिध्वनित किया। हमारे छात्रों पर हो रहे अन्याय और हिंसा को निडरता से उजागर किया। जब युवा भारत की आवाज संसद में गूंजती है, तो लोकतंत्र मजबूत होता है।' इस पोस्ट पर बीएल संतोष ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और लिखा, 'कैबिनेट विस्तार के लिए कांग्रेस आलाकमान से इजाजत मिलने की उम्मीद में दिल्ली में तीन दिनों से इंतजार कर रहे हैं। अच्छा टाइमपास है। साथ ही कुछ वफादारी के अंक भी बटोरे जा रहे हैं। शुभकामनाएं।' इस ट्वीट ने कर्नाटक सरकार पर कई बड़े राजनीतिक निशाने साधे। संतोष ने यह स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री होने के बावजूद डीके शिवकुमार को कैबिनेट विस्तार के लिए दिल्ली में तीन दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। भाजपा ने इस दौरे को 'अच्छा टाइमपास' बताकर यह संदेश देने की कोशिश की कि जब राज्य में प्रशासनिक काम लंबित हैं, तब मुख्यमंत्री दिल्ली में वक्त बिता रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएल संतोष का यह तंज पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से ही डीके शिवकुमार पर कैबिनेट विस्तार, मंत्रियों के विभागों के फेरबदल और बोर्ड-निगमों के अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर भारी आंतरिक दबाव है। सिद्धारमैया खेमे और डीके शिवकुमार खेमे के बीच सत्ता के संतुलन को बनाए रखना आलाकमान के लिए भी एक टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। कई विधायक मंत्री पद की आस में बैठे हैं। ऐसे में कोई भी फैसला लेने से पहले दिल्ली की मुहर लगना अनिवार्य हो चुका है। डीके शिवकुमार का यह दिल्ली दौरा इसी उलझन को सुलझाने की एक कवायद माना जा रहा है।
















