Supreme Court's Remarks: क्या राजनीतिक दलों के भीतर भी हो आंतरिक लोकतंत्र?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के दो गुटों के बीच चल रहे कानूनी विवाद की सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने राजनीतिक दलों में आंतरिक
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के दो गुटों के बीच चल रहे कानूनी विवाद की सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के महत्व पर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल संवैधानिक संस्थाओं से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों से भी यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे आंतरिक लोकतंत्र के सिद्धांतों का पालन करें। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक सिद्धांत केवल संस्थाओं तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि राजनीतिक दलों को भी इन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के संशोधित संविधान पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि संशोधनों के बाद यह पार्टी व्यावहारिक रूप से 'एक-व्यक्ति का ढांचा' बन गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट द्वारा चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई जारी रखते हुए, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को 'वास्तविक शिवसेना' के रूप में मान्यता दी गई है, कहा कि जब संस्थाओं से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है, तो राजनीतिक दलों की भी जांच होनी चाहिए कि क्या वे लोकतांत्रिक तरीके से काम करते हैं। पीठ ने कहा, 'शुरुआत में, पार्टी (शिवसेना) का संविधान लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित था। बाद में, इसमें संशोधन किया गया और यह असल में एक व्यक्ति के नियंत्रण वाला ढांचा बन गया।' यह टिप्पणी राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की आवश्यकता को उजागर करती है, जो कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक है।
















