







9 अगस्त 1942 का दिन 1857 की क्रांति के बाद आजादी के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण जनक्रांति दिवस है। 8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासमिति द्वारा बम्बई
9 अगस्त 1942 का दिन 1857 की क्रांति के बाद आजादी के आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण जनक्रांति दिवस है। 8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासमिति द्वारा बम्बई में 'करो या मरो, भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पारित किया गया था। इस प्रस्ताव के पारित होने के अगले दिन, 9 अगस्त को, बम्बई में हजारों राष्ट्र भक्तों ने राष्ट्र ध्वज फहराने का प्रयास किया। इस प्रयास को रोकने के लिए अंग्रेजों ने लाठीचार्ज और गोलीबारी की, जिसमें कई लोग घायल हुए और कुछ की जान भी गई। इस संघर्ष में अरुणा आसफ अली ने तिरंगा फहराने की साहसिकता दिखाई। अगस्त क्रांति आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने हर संभव उपाय अपनाया। जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक 'दि डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में लिखा है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस और फौज की गोलीबारी में 1,020 लोगों की जान गई और 3,200 जख्मी हुए। हालांकि, आम जनता का अनुमान है कि मारे गए लोगों की संख्या लगभग 25,000 थी। डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुसार, शहीदों, घायलों और फर्जी मुकदमे झेलने वालों की संख्या 50,000 से अधिक थी। अगस्त क्रांति आंदोलन 1857 के बाद स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जनआंदोलन था, जिसमें रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहेब जैसे दिग्गजों ने नेतृत्व किया। इस विद्रोह के बाद कांग्रेस का गठन ए.ओ. हयूम, दादा भाई नौरोजी और बदरूद्दीन तैयब जी के सहयोग से किया गया। अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल और महाराष्ट्र में जबरदस्त आंदोलन चलाए गए, जिनका नेतृत्व अरविन्दो घोष और लाला लाजपतराय जैसे क्रांतिकारियों ने किया। लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन ने इस आंदोलन को और तेज कर दिया। तिलक जी ने ऐनी बेसेंट के साथ मिलकर होम रूल लीग बनाई और 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच लखनऊ पेक्ट हुआ। जब अंग्रेजों ने भारतीयों के मूल अधिकारों को चुनौती दी, तब गांधीजी ने सत्याग्रह शुरू किया। जलियाँवाला बाग में जनरल डॉयर द्वारा किए गए नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया। तिलक जी की मृत्यु ने राष्ट्रीय भावना को और मजबूत किया। भारत छोड़ो आंदोलन के पहले गांधीजी ने कई बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाए। 28 दिसंबर 1931 से 1934 तक सतत आंदोलन चलते रहे। इस बीच कांग्रेस ने नया संविधान बनाने की प्रक्रिया में भी भाग लिया। 1939 में बिना सलाह मशविरा के अंग्रेजों ने भारत के युद्ध में शामिल होने की घोषणा की, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। जापान ने ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध शुरू किया और सिंगापुर, मलेशिया और रंगून पर कब्जा कर लिया। इस दौरान अमरीका और चीन ने ब्रिटिश सरकार पर कांग्रेस के साथ समझौता करने के लिए दबाव डाला। अंग्रेजों ने स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा, लेकिन सभी राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया। डॉ. लोहिया ने इसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद की योजना बताया, जिसका उद्देश्य भारत को कई टुकड़ों में बांटना था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डॉ. लोहिया ने 'कपटी जापान और आत्म संतुष्ट ब्रिटेन' नामक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने दोनों को खतरनाक बताया। गांधीजी भी मानते थे कि भारत केवल पूर्ण स्वतंत्रता के बाद ही फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में सही और प्रभावशाली योगदान दे सकता है। 'करो या मरो' आंदोलन के दौरान आम नागरिकों ने थानों, सचिवालयों और सरकारी कार्यालयों पर तिरंगा फहराने का प्रयास किया, जिसे अंग्रेजों ने हर कीमत पर विफल करना चाहा। 7-8 अगस्त 1942 को पारित प्रस्ताव में कहा गया कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ब्रिटिश सत्ता को हटाने की मांग करती है। अस्थाई सरकार का गठन किया जाएगा, जिसमें सभी महत्वपूर्ण वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा। प्रस्ताव पर महात्मा गांधी ने भाषण देते हुए कहा कि उन्होंने जो कार्य का बीड़ा उठाया है, उसे पूरी लगन से पूरा करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हर एक भारतीय को अपने आप को आजाद समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं इस लड़ाई में आपका नेतृत्व करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता हूँ। गांधीजी ने कहा कि हमने कांग्रेस को बाजी पर लगा दिया है। उन्होंने कहा कि हम या तो भारत को आजाद कराएंगे या ऐसा करते हुए मर जाएंगे। लोहिया को 20 मई 1944 को बम्बई में गिरफ्तार किया गया और उन्हें लाहौर किले में स्थानांतरित किया गया, जहां उन्हें प्रताड़ित किया गया। अक्टूबर 1945 में उनके पिता हीरालाल लोहिया की मृत्यु हो गई। लेकिन उन्होंने जेल से रिहा होने से इन्कार कर दिया। जेल से छूटने के बाद जानकारी मिलने पर जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें बधाई दी।


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