High Court Ruling: नाबालिग के केस में अपील का अधिकार नहीं

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी नाबालिग के कानूनी अभिभावक पहले ही अदालत में मुकदमा लड़ चुके हैं, तो बालिग होन
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी नाबालिग के कानूनी अभिभावक पहले ही अदालत में मुकदमा लड़ चुके हैं, तो बालिग होने के बाद वह केवल इस आधार पर वर्षों बाद फैसले को चुनौती नहीं दे सकता कि उस समय वह नाबालिग था। जस्टिस दीपक गुप्ता ने इस संदर्भ में एक मामला सुनते हुए कहा कि नाबालिग होने का संरक्षण (लीगल डिसएबिलिटी) पहले से समाप्त हो चुके मुकदमे को दोबारा खोलने का अधिकार नहीं देता। यह निर्णय गुरुग्राम निवासी जावेद की अपील के संदर्भ में आया, जिसमें उसने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) के वर्ष 2007 के मुआवजा आदेश को लगभग 10 वर्ष (3266 दिन) की देरी के बाद चुनौती दी थी। अदालत ने जावेद की देरी माफ करने की अर्जी को भी नामंजूर कर दिया।
इस मामले की पृष्ठभूमि में, 12 दिसंबर 2005 को एक ट्रक की चपेट में आने से जाकिर की मौत हो गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी, चार नाबालिग बच्चों और माता-पिता ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 163-ए के तहत मुआवजे का दावा दायर किया था। गुरुग्राम स्थित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 7 दिसंबर 2007 को परिवार के पक्ष में 3.70 लाख रुपये मुआवजा ब्याज सहित देने का आदेश दिया था। लगभग दस साल बाद, मृतक के पुत्र जावेद ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। उन्होंने कहा कि जब ट्रिब्यूनल का फैसला आया तब वह नाबालिग थे और उन्हें विश्वास था कि उनकी मां ने मुआवजा बढ़ाने के लिए पहले ही अपील कर दी है।
हालांकि, बालिग होने के बाद जब जावेद ने अपने वकील से संपर्क किया, तो उन्हें पता चला कि कोई अपील दायर नहीं की गई थी। इसी आधार पर उन्होंने 3266 दिन की देरी माफ करने की मांग की। हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि लगभग 10 वर्ष जैसी असाधारण देरी को सामान्य रूप से माफ नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि देरी तभी माफ होगी जब पूरी अवधि का संतोषजनक और वास्तविक कारण बताया जाए। जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि जावेद ने ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में अपनी मां और प्राकृतिक अभिभावक के माध्यम से विधिवत प्रतिनिधित्व किया था। अदालत ने यह भी कहा कि केवल बालिग हो जाने से किसी व्यक्ति को पुराने फैसले को चुनौती देने का नया अधिकार नहीं मिलता।
















