Island of Slavery: गुलामों का द्वीप... जहां जन्म लेते ही बच्चों पर हो जाता है मालिक का हक

दुनिया 21वीं सदी में प्रवेश कर चुकी है, और कई देशों में गुलामी को समाप्त हुए एक सदी से अधिक समय हो चुका है। लेकिन इंडोनेशिया का सुम्बा द्वीप आज भी एक ऐसा स्थान
दुनिया 21वीं सदी में प्रवेश कर चुकी है, और कई देशों में गुलामी को समाप्त हुए एक सदी से अधिक समय हो चुका है। लेकिन इंडोनेशिया का सुम्बा द्वीप आज भी एक ऐसा स्थान है, जहां बच्चे जन्म लेते ही किसी और की संपत्ति माने जाते हैं। यहां के निवासियों को बचपन से ही अपने मालिक की सेवा करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें बिना मजदूरी के खेतों में काम करना पड़ता है, घर के सारे काम संभालने होते हैं और मालिक के हर आदेश का पालन करना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। कई लोगों का आरोप है कि यहां गुलाम महिलाओं के साथ यौन शोषण और मारपीट जैसी घटनाएं भी होती हैं। यह स्थिति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि एक अमानवीय व्यवस्था का भी प्रतीक है।
सुम्बा द्वीप, जो बाली के प्रसिद्ध समुद्री तटों से महज दो घंटे की दूरी पर स्थित है, बाहर से देखने पर एक खूबसूरत पर्यटन स्थल नजर आता है, लेकिन इसके भीतर एक ऐसी परंपरा आज भी जीवित है, जिसे दुनिया गुलामी कहती है। यहां के एक निवासी ने अपनी पहचान छिपाते हुए बताया कि उसे बचपन से ही मालिक के खेतों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। वह कहता है कि अगर वह ठीक से काम नहीं करता था, तो उसे पीटा जाता था। अब वह अपने बच्चों को केवल एक बात कहता है कि वह नहीं चाहता कि वे वही जिंदगी जीएं, जो उसने जी है। दूसरी ओर, कनिसियस कान्याली हम्बारिता, जो खुद को गुलाम मानते हैं, का कहना है कि यह उनकी पहचान का हिस्सा है। उनका मालिक उन्हें परिवार के सदस्य की तरह रखता है, लेकिन यह स्थिति भी एक तरह से गुलामी की परिभाषा में आती है।
इंडोनेशिया में गुलामी पर 160 साल पहले रोक लगा दी गई थी, लेकिन सुम्बा द्वीप पर यह परंपरा अब भी कायम है। यहां समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में बंटा हुआ है: मराम्बा, कबीहू और अता। मानवाधिकार कार्यकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि यही सामाजिक ढांचा पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी को जीवित रखे हुए है। इस व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति सबसे अधिक खराब है, जहां उन्हें मालिक की संपत्ति समझा जाता है। एक 18 साल की लड़की ने आरोप लगाया कि जब वह 13 साल की थी, तब से उसके मालिक और उसके बेटे ने उसका यौन शोषण किया। हालांकि, सरकार इस व्यवस्था को खत्म करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। कुछ जमींदार परिवार इस परंपरा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह प्रक्रिया धीमी है। सुम्बा की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि केवल कानून बनाने से गुलामी खत्म नहीं होती, जब तक समाज की सोच नहीं बदलती, तब तक कुछ लोग आज भी जन्म से पहले ही अपनी आजादी हार जाते हैं।
















