Manusmriti's Controversial Legacy: मनुस्मृति की विवादास्पद विरासत

मनुष्य की स्मृति केवल देखे और सुने से नहीं बनती। इतिहास उसमें एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर शामिल रहता है। इसी इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से व्यक्ति अपने श्रेष्ठ को
मनुष्य की स्मृति केवल देखे और सुने से नहीं बनती। इतिहास उसमें एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर शामिल रहता है। इसी इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से व्यक्ति अपने श्रेष्ठ को समझता है, गर्व को पहचानता है, शक्ति का अनुमान लेता है, पराजयों से सबक लेता है और मलिनताओं को स्वीकारता है। लेकिन कल्पना कीजिए कि हम स्मृतिबोध का चश्मा किसी और को सौंपकर ख़ुद आंखें मूंदें रहें और उसकी सुविधा के समायोजन को ही सत्य मानकर स्वीकार कर बैठें? इससे बड़ी आत्महंता अवस्था क्या हो सकती है क्योंकि किराए की आंखों से दूसरे की सुविधा दिखती है, अपनी सच्चाई नहीं। भारतीय धर्म-परंपरा, जातिगत राजनीति और संविधान को एकसाथ प्रभावित करने वाली इसी सच्चाई का नाम है मनुस्मृति।
मनुस्मृति पर जितना शोर है, उतना शोध नहीं है। जितने मत हैं, उतने तथ्य नहीं हैं। जितने फैसले हैं, उतने प्रमाण नहीं हैं। कोई उसे सामाजिक विषमता की जड़ कहता है। कोई हिंदू सभ्यता का आधारग्रंथ। कोई उसे जलाने की बात करता है। कोई उसे बचाने की, लेकिन इस पूरे शोर में एक सवाल है, जो मुझे बेचैन करता है। वह है। हम जिस मनुस्मृति पर बहस कर रहे हैं, क्या वह सचमुच वही मनुस्मृति है, जिसे कभी मनु ने लिखा था? यही सवाल मेरी बेचैनी की वजह है।
मैं यह सिद्ध करने नहीं बैठा हूं कि मनुस्मृति सही है या गलत। मैं केवल इतना जानना चाहता हूं कि अगर आज हमारे हाथ में जो मनुस्मृति है, वही मूल मनुस्मृति है, तो उसके भीतर इतने गहरे अंतर्विरोध क्यों हैं? और अगर वह मूल नहीं है, अगर सचमुच उसके साथ छेड़छाड़ हुई है, अगर उसमें क्षेपक जोड़े गए हैं, तो फिर आजादी के लगभग अस्सी वर्ष बाद भी हम उसी कथित दूषित पाठ का बोझ क्यों ढो रहे हैं? उसकी प्रामाणिकता पर हमारी इस चुप्पी का मतलब क्या है? धर्म ध्वजाधारियों और धर्माचार्यों को यह बताना होगा कि इस किताब का कौन-सा पाठ प्राचीन और प्रामाणिक है और कौन-सा संदिग्ध। यह नहीं हो सकता कि एक ही सांस में हम कहें- मनुस्मृति पवित्र भी है और उसी सांस में यह भी कहें- उसमें अंग्रेजों ने मिलावट भी कर दी थी। इन दोनों बातों के बीच की दूरी केवल नारे नहीं भर सकते। उसके लिए अनुसंधान चाहिए। पांडुलिपियों का तुलनात्मक अध्ययन चाहिए। विद्वानों का धैर्य चाहिए। धर्माचार्यों का साहस चाहिए। और सबसे बढ़कर चाहिए- सत्य को स्वीकार करने का साहस। मुझे लगता है, पिछले सौ वर्षों में हमने मनुस्मृति पर जितनी राजनीति की, उस श्रम का दसवां हिस्सा भी उसकी प्रामाणिकता पर नहीं लगाया। हमने उसके पक्ष में भाषण दिए। उसके विरोध में आंदोलन किए। लेकिन यह जानने की बेचैनी बहुत कम दिखाई दी कि असल मनुस्मृति कौन-सी है?
अगर भारतीय परंपरा के सबसे सुंदर सूत्र-वाक्यों में से किसी एक को चुनना हो, तो मेरी पहली पसंद होगी: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः। (मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 56) यानी- जहां स्त्री का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है। जहां स्त्री का सम्मान नहीं होता, वहां सारे शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं। बहुत कम लोगों को पता है कि यह श्लोक मनुस्मृति का ही है। हर बार इसे पढ़ता हूं तो मन श्रद्धा से भर जाता है। लेकिन हर बार एक सवाल भी जन्म लेता है। जो ग्रंथ स्त्री के सम्मान को देवत्व की शर्त बना सकता है, वही यह कैसे कह सकता है कि स्त्री जीवन भर पिता, पति या पुत्र के संरक्षण में रहे? और वही यह कैसे कह सकता है- स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्। अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः। मतलब- स्त्री का स्वभाव ही पुरुष को दूषित करने वाला है (मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 213 कुछ संस्करणों में क्रम भिन्न मिलता है)। यहीं मैं ठहर जाता हूं। इतना बड़ा अंतर्विरोध सहज नहीं लगता। या तो मैं मनुस्मृति को ठीक से नहीं समझ पाया हूं। या फिर मनुस्मृति की कहानी, मनुस्मृति से कहीं अधिक जटिल है। लेकिन विरोधाभास यहीं समाप्त नहीं होता। जाति के प्रश्न पर भी मनुस्मृति ऐसे ही कठिन सवाल खड़े करती है।
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः। कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाऽस्यावकर्तयेत्। (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 280 कुछ संस्करणों में 281) यानी- यदि निम्न वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के साथ समान आसन पर बैठने का प्रयास करे, तो उसे दंडित किया जाए। उसके नितंब काट दिए जाए। एक दूसरा श्लोक कहता है- शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसञ्चयः। शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते। (मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 126 कुछ संस्करणों में 129) मतलब शूद्र को धन संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके धनवान होने से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचता है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इन्हीं श्लोकों को सदन में उद्धृत किया जिस पर हंगामा हुआ। सत्ता पक्ष को कहना पड़ा कि यह मनुस्मृति का है ही नहीं, जबकि जवाब यह होना चाहिए था कि भले यह लाइने मनुस्मृति में हो, हम इन श्लोकों का समर्थन नहीं करते, कोई भी सभ्य समाज इसके पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता। हम इसकी निंदा करते हैं। एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्। जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः। (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 269 कुछ संस्करणों में 270) शुद्र यदि द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- को गाली देता है, तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि नीच वर्ण का होने से वह इसी दण्ड का अधिकारी है। एक और श्लोक देखिए: नामजातिग्रहं त्वेषां अभिद्रोहेण कुर्वतः। निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः। (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 270 कुछ संस्करणों में 271) यानी- शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के नाम और जाति का उच्चारण करने पर उसके मुंह पर दस अंगुल लम्बी लोहे की जलती कील ठोंक देनी चाहिए। धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः। तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः। (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 271 कुछ संस्करणों में 272) मतलब शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुँह और कान में गरम तेल डलवा देना चाहिए। अगर आज कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से ऐसी बातें कहे, तो समाज भी उसका विरोध करेगा और भारतीय संविधान भी। इसलिए इन विचारों का आधुनिक भारत में कोई नैतिक बचाव संभव नहीं है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। अगर ये श्लोक मूल हैं, तो उनका सामना कीजिए। लेकिन अगर ये मूल नहीं हैं, अगर ये वही क्षेपक हैं, जिनका वर्षों से दावा किया जाता रहा है, तो फिर ये आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? आखिर ये विवादित श्लोक हमारे घरों तक पहुंचे कैसे? और अगर पहुंच गए, तो हमने उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचने क्यों दिया? मनुस्मृति को लेकर सबसे अधिक चर्चा उसके विवादित श्लोकों की होती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही ग्रंथ धर्म के दस लक्षण भी बताता है: धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्। (मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 92) धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध यही धर्म के दस लक्षण हैं। मनु स्मृति पर हमेशा यह आरोप भी लगता है कि इसने समाज के निचले तबके के प्रति न्याय नहीं किया। केवल उनके शोषण की बात कही। कहीं-कहीं यह सच भी लगती है। स्मृति को पूरा पढ़ें तो कहीं ब्राह्मणों के प्रति भी तल्खी दिखेगी। स्मृति ब्राह्मण कर्म को लेकर ज़्यादा सजग और सचेत दिखती है। जैसे ब्राह्मण होने की जो शर्त मनुस्मृति बताती है वह वेदपाठी होना चाहिए और उसे शिक्षा का व्यापार नहीं करना चाहिए। स्मृति इस बात पर पूरा जोर देती है। इस व्यवस्था में कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए ब्राह्मण नहीं है क्योंकि वह ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ है। हर व्यक्ति को ब्राह्मण होने के प्रतिमानों को व्यक्तिगत रूप में पूरा करना पड़ता है। यहां जन्मना ब्राह्मण के लिए कोई स्थान नहीं है, ब्राह्मण अर्थात् योग्यता। ब्राह्मण वर्ग की पक्षधरता को लेकर तुलसीदास पर जो आरोप लगाएं जाते हैं, वह मनुस्मृति के संदर्भ में सच नहीं प्रतीत होते। तुलसीदास सील गुन हीन विप्र को भी पूज्य कहते हैं, लेकिन मनुस्मृति इसका विरोध करती है। यह पढ़कर मनुस्मृति से शिकायत नहीं होती। सम्मान बढ़ता है, लेकिन सम्मान के साथ फिर प्रश्न भी उठता है।
















