'सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः। कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाऽस्यावकर्तयेत्॥' (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 280) यानी- यदि निम्न वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के साथ समान आसन पर बैठने का प्रयास करे, तो उसे दंडित किया जाए। उसके नितंब काट दिए जाए। एक दूसरा श्लोक कहता है- 'शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसञ्चयः। शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते॥' (मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 126) मतलब शूद्र को धन संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके धनवान होने से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचता है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इन्हीं श्लोकों को सदन में उद्धृत किया, जिस पर हंगामा हुआ। सत्ता पक्ष को कहना पड़ा कि यह मनुस्मृति का है ही नहीं, जबकि जवाब यह होना चाहिए था कि भले ये लाइने मनुस्मृति में हों, हम इन श्लोकों का समर्थन नहीं करते, कोई भी सभ्य समाज इसके पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता। हम इसकी निंदा करते हैं।
'एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्। जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥' (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 269) शुद्र यदि द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- को गाली देता है, तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि नीच वर्ण का होने से वह इसी दंड का अधिकारी है। एक और श्लोक देखिए 'नामजातिग्रहं त्वेषां अभिद्रोहेण कुर्वतः। निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥' (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 270) यानी- शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के नाम और जाति का उच्चारण करने पर उसके मुंह पर दस अंगुल लम्बी लोहे की जलती कील ठोंक देनी चाहिए। 'धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः। तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥' (मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 271) मतलब शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुँह और कान में गरम तेल डलवा देना चाहिए। अगर आज कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से ऐसी बातें कहे, तो समाज भी उसका विरोध करेगा और भारतीय संविधान भी। इसलिए इन विचारों का आधुनिक भारत में कोई नैतिक बचाव संभव नहीं है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। अगर ये श्लोक मूल हैं, तो उनका सामना कीजिए। लेकिन अगर ये मूल नहीं हैं, अगर ये वही क्षेपक हैं, जिनका वर्षों से दावा किया जाता रहा है, तो फिर ये आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? आखिर ये विवादित श्लोक हमारे घरों तक पहुंचे कैसे? और अगर पहुंच गए, तो हमने उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचने क्यों दिया? मनुस्मृति को लेकर सबसे अधिक चर्चा उसके विवादित श्लोकों की होती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही ग्रंथ धर्म के दस लक्षण भी बताता है 'धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥' (मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 92) धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध यही धर्म के दस लक्षण हैं। मनु स्मृति पर हमेशा यह आरोप भी लगता है कि इसने समाज के निचले तबके के प्रति न्याय नहीं किया। केवल उनके शोषण की बात कही। कहीं-कहीं यह सच भी लगती है। स्मृति को पूरा पढ़ें तो कहीं ब्राह्मणों के प्रति भी तल्खी दिखेगी। स्मृति ब्राह्मण कर्म को लेकर ज़्यादा सजग और सचेत दिखती है। जैसे ब्राह्मण होने की जो शर्त मनुस्मृति बताती है वह वेदपाठी होना चाहिए और उसे शिक्षा का व्यापार नहीं करना चाहिए। स्मृति इस बात पर पूरा जोर देती है। इस व्यवस्था में कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए ब्राह्मण नहीं है क्योंकि वह ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ है। हर व्यक्ति को ब्राह्मण होने के प्रतिमानों को व्यक्तिगत रूप में पूरा करना पड़ता है। यहां जन्मना ब्राह्मण के लिए कोई स्थान नहीं है, ब्राह्मण अर्थात् योग्यता। ब्राह्मण वर्ग की पक्षधरता को लेकर तुलसीदास पर जो आरोप लगाएं जाते हैं, वह मनुस्मृति के संदर्भ में सच नहीं प्रतीत होते। तुलसीदास सील गुन हीन विप्र को भी पूज्य कहते हैं, लेकिन मनुस्मृति इसका विरोध करती है। यह पढ़कर मनुस्मृति से शिकायत नहीं होती, सम्मान बढ़ता है, लेकिन सम्मान के साथ फिर प्रश्न भी उठता है।