Reservation Debate Intensifies: SC-ST आरक्षण पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान

पिछले कुछ दिनों में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (rss) के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक
पिछले कुछ दिनों में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने आरक्षण का लाभ उठाकर सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्की की है, उन्हें उदारता दिखाते हुए खुद पीछे हट जाना चाहिए, ताकि उनके समुदाय के अन्य सदस्य भी इसका लाभ उठा सकें। यह बयान 12 अक्टूबर 2023 को एक कार्यक्रम में दिया गया था।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट में SC, ST, OBC और EWS आरक्षण के भीतर आय-आधारित उप-वर्गीकरण (सब-कोटा) को लेकर सुनवाई चल रही है। केंद्र सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया है, जिसमें आय के आधार पर आरक्षित वर्गों के भीतर वर्गीकरण की मांग की गई थी। केंद्र का तर्क है कि आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ापन है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने यह स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत SC और ST पर लागू नहीं होता।
आरक्षण के मुद्दे पर बहस कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल में मोहन भागवत और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है। भागवत ने कहा कि आरक्षण के लाभार्थियों को यह सोचकर पीछे हटना चाहिए कि इससे उनके समुदाय के अन्य सदस्य भी आगे बढ़ सकें। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की सोच को भी उद्धृत किया, यह कहते हुए कि अगर हम उनकी सलाह का पालन करें, तो कोई समस्या नहीं होगी।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आरक्षण की सूचियों में बदलाव करना पूरी तरह से संसद का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूचियों में केवल संसद ही संशोधन कर सकती है। इसके अलावा, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC/SEBC) की केंद्रीय सूची में भी बदलाव केवल संसद द्वारा पारित कानून के जरिए ही हो सकता है। सरकार ने इस आधार पर याचिकाकर्ता द्वारा अदालत से आदेश की मांग करने को न्यायिक दायरे से बाहर की बात बताया है।
आरक्षण की व्यवस्था भारतीय संविधान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उन समुदायों को मुख्यधारा में लाना है, जो सदियों से सामाजिक भेदभाव और जातिगत छुआछूत का शिकार रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने माना था कि कानूनी समानता देने से सामाजिक असमानता खत्म नहीं होगी, इसलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी आरक्षण के दायरे में लाया गया। हाल के वर्षों में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
सरकार का रुख यह है कि SC/ST आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव है। इसलिए इसमें आर्थिक आधार पर वर्गीकरण या क्रीमी लेयर जैसा सिद्धांत लागू करना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही मौजूदा बहस और मोहन भागवत के बयान, दोनों ही इस बुनियादी सवाल से जुड़े हैं कि आरक्षण किसे, कब तक और किस आधार पर मिलना चाहिए।
















