Sambhal Violence: SIT Report Exposes Conspirators Behind Unrest

संभल का इतिहास केवल विवादों का नहीं, बल्कि यह सनातन संस्कृति का एक पवित्र स्थान भी है। प्राचीन काल से संभल हिंदुओं का एक प्रसिद्ध आस्था केंद्र रहा है, जहां भगवा
संभल का इतिहास केवल विवादों का नहीं, बल्कि यह सनातन संस्कृति का एक पवित्र स्थान भी है। प्राचीन काल से संभल हिंदुओं का एक प्रसिद्ध आस्था केंद्र रहा है, जहां भगवान हरिहर नाथ (भगवान विष्णु) का मंदिर स्थित है। शास्त्रों और लोक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु यहां अपने दसवें कल्कि अवतार के रूप में अवतरित होंगे। वर्ष 1526 में मुगल आक्रांता बाबर ने इस प्राचीन मंदिर को तुड़वा दिया था। न्यायालय के आदेश पर जब इस ऐतिहासिक स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने के लिए टीम पहुंची, तो एक सोची-समझी साजिश के तहत विरोध और उपद्रव का माहौल तैयार किया गया।
सर्वेक्षण के दौरान भीड़ को उकसाकर पुलिस और सर्वे टीम पर प्राणघातक हमले किए गए। उपद्रवियों ने पथराव और गोलीबारी की, जिसमें कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। दंगाइयों का मुख्य उद्देश्य संभल को हिंदू-मुस्लिम दंगे की आग में झोंकना था। हालांकि, उत्तर प्रदेश पुलिस और स्थानीय प्रशासन की तत्परता, कठोरता और चुस्त-दुरुस्त रणनीति के कारण स्थिति पर तुरंत नियंत्रण पाया गया और दंगा फैलने से रोक दिया गया।
संभल में दंगों का एक लंबा और दर्दनाक इतिहास रहा है, लेकिन यह पहली बार हुआ है कि घटना के तुरंत बाद 123 दंगाइयों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट पर न्यायालय में ट्रायल शुरू हो चुका है और दोषियों को सख्त सजा होना तय है। एसआईटी की जांच और साक्ष्यों ने इस पूरी साजिश के चेहरों को बेनकाब कर दिया है। सर्वे के विरोध और दंगे की साजिश में मुख्य भूमिका संभल के समाजवादी पार्टी सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने निभाई। उनके खिलाफ बिजली चोरी के मामले में 1 करोड़ 91 लाख रुपये की रिकवरी निकाली गई है, जिसमें से उन्होंने मात्र 6 लाख रुपये जमा किए हैं।
सपा विधायक इकबाल महमूद का बेटा सुहैल इकबाल, जामा मस्जिद इंतज़ामिया कमेटी का सदर ज़फ़र अली, सचिव और वकील महसूद अली फ़ारूक़ी, एडवोकेट क़ासिम ज़माल और नततन (लड्ढन) ख़ान भी इस साजिश में प्रमुखता से शामिल रहे। इस हिंसा के तार अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट से भी जुड़े हैं। फरार अपराधी तारिक साटा दुबई में बैठकर इस गिरोह का संचालन कर रहा था। तारिक दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र से हर साल 300 से 350 लग्जरी गाड़ियों की चोरी करवाता था। इन गाड़ियों को नेपाल और उत्तर-पूर्व के रास्तों से विदेशों में बेचा जाता था। इस अवैध कमाई का इस्तेमाल विदेशी हथियारों की तस्करी और संभल जैसे स्थानों पर दंगाइयों को हथियार उपलब्ध कराने में किया जाता था।
संभल में 1920 के दशक से लेकर अब तक 16 बड़े दंगे हो चुके हैं। पिछली सरकारों की तुष्टिकरण नीतियों के कारण दंगाइयों पर कभी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिसका परिणाम यहां जनसांख्यिकी परिवर्तन के रूप में सामने आया। आजादी के समय संभल कस्बे में 45% हिंदू और 55% मुस्लिम आबादी थी। लगातार होने वाले दंगों, प्रताड़ना और असुरक्षा के कारण हिंदुओं को यहां से पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा। आज संभल कस्बे में हिंदुओं की आबादी घटकर मात्र 15-20 प्रतिशत रह गई है। 29 मार्च 1978 को होली के दिन संभल में भीषण हिंसा हुई थी, जिसमें 184 हिंदुओं की नृशंस हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा हिंदू समुदाय के सैकड़ों लोग घायल हुए और उनकी संपत्तियां लूट ली गईं।
1978 के दंगे के मुकदमों में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की थी और अदालत से निर्णय आने ही वाला था। लेकिन दिसंबर 1993 में जैसे ही मुलायम सिंह यादव दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, सरकार ने मात्र 18 दिनों के भीतर 1978 दंगे के अभियुक्तों के खिलाफ चल रहे सभी मुकदमों को अदालत से वापस ले लिया। शफ़ीकुर्रहमान बर्क और आज़म ख़ान जैसे नेताओं के दबाव में मुकदमों की वापसी के बाद संभल के हिंदुओं को अपनी जमीन, मकान, पुश्तैनी मंदिर, ऐतिहासिक कुएं और बावड़ियां छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा।
1978 के दंगे के बाद से ही संभल में अपराधियों और दंगाइयों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। लेकिन आज उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कानून का राज स्थापित है। 24 नवंबर 2024 की घटना में सरकार ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता या सांसद क्यों न हो, यदि वह राज्य की शांति और सुरक्षा से खिलवाड़ करेगा, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। पहली बार दंगाई जेल की सलाखों के पीछे हैं और उन्हें अदालत से सख्त से सख्त सजा मिलना तय है। कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले हर तत्व के खिलाफ यह कठोर कानूनी लड़ाई बिना किसी समझौते के जारी रहेगी।
















